___लालच आदमी को नामर्द बना देता हैं उसूल भी नहीं आते हैं काम
____ बंगाल के नवाब सिराजुद्धौला के दरबार में उपस्थित होकर ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रतिनिधि राबर्ट क्लाईव, बंगाल में व्यापार करने की अनुमति मांग रहा था. सिराजुद्दौला ने साफ मना कर दिया…कहा…मेरे नाना ने कहा है, सब पर विश्वास करना, मगर अंग्रेजों पर मत करना, इसलिये आप बाहर जायें.
क्लाईव ने युद्ध की धमकी दी, सिराजुद्दौला ने कहा, मुझे युद्ध करना मंजूर है, लेकिन तुमको यहां व्यापार करने की अनुमति नही दूँगा.
बंगाल के पूर्व नवाब, अलीवर्दी खाँ को बेटा नही था, उन्हें सिर्फ तीन बेटियां थीं, इसलिये उन्होंने अपनी मंझली बेटी के पुत्र सिराज़ुद्दौला को अपना उत्तराधिकारी बनाया था…अलीवर्दी खाँ अंग्रेजों के बहुत खिलाफ थे और उन्हें कभी प्रश्रय नही दिये.
सिराजुद्दौला ने राबर्ट क्लाईव की चुनौती को स्वीकार किया और तय हुआ 23 जून 1757 को पलासी के मैदान में युद्ध होगा (पलासी, बंगाल की तत्कालीन राजधानी मूर्शीदाबाद से 22 की0मी0 दूर नदिया ज़िले में अवस्थित है)
सिराजुद्दौला ने अपने गुप्तचरों से पता कराया तो पता चला कि क्लाईव के पास मात्र 3050 (950 यूरोपियन और 2100 भारतीय) सैनिक हैँ..सिराजुद्दोला निश्चिंत हो गया कि उसके अठारह हजार सैनिक मिनटों में राबर्ट क्लाईव को मसल देंगे, इसलिये अति आत्मविस्वास में स्वयं नही जाकर अपने सेंनापति मीर जाफर को भेज दिया!
पलासी के मैदान में सिराजुद्दौला की विशाल फौज देखकर राबर्ट क्लाईव के हाँथ पाँव फूल गये…लेकिन क्लाईव जानता था कि अगर हिन्दुस्तानियों को लालच दो तो वे अपनी मातृभूमि क्या, सात पुस्तों को भी बेच देंगे…उसने तुरंत मीरजाफर को संधि प्रस्ताव भेजा और उसे बंगाल और विहार का नवाब बनाने का लालच दिया…मीरजाफर स्वार्थ में अंधा होकर क्लाईव के जाल में फंस गया और संधि हो गयी….कुछ लोग कहते हैँ कि पलासी में बडा भीषण युद्ध हुआ, वे गलत कहते हैँ, पलासी में कोई युद्ध नही हुआ सिर्फ संधि हुयी, और इस संधि के तहत अठारह हजार की फौज के साथ एक सेंनापति तीन हजार की फौज के सामने आत्मसमर्पण कर दिया!
प्रसिद्ध इतिहासकार पनिवकर कहते हैँ….पलासी का युद्ध वास्तव में कोई युद्ध नही था, यह एक षड्यंत्र और विस्वासघात का घीनौना प्रदर्शन था, लेकिन इसका स्थान विश्व के निर्णायक युद्धों में से एक है, क्योकि इसी के द्वारा बंगाल से भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नीव डालने की शुरुआत हुयी और एक व्यापारिक संस्था ने राजनीतिक बागडोर अपने हांथो में ले ली.
अब राबर्ट क्लाईव अपनी डायरी में लिखता है..जब मैने मीरजाफर को संधि के जाल में फंसा लिया तो हमलोग मूर्शीदाबाद की ओर प्रस्थान किये, मैँ आगे घोडे पर सवार मेरे पीछे मेरे 950 यूरोपियन सिपाही और उसके पीछे बीस हजार भारतीय फौज..हमलोग जब जा रहे थे, तो सड़क के दोनो किनारे खड़े भारतीय ताँलिया बजा रहे थे, अगर ये विरोध में एक एक पत्थर भी चला देते तो हम सभी मारे जाते.
वैसे इस दुरभिसंधि में मीरजाफर अकेले नहीं था, उसके साथ लाला जगतनारायण, दुर्लभ राय, सेठ ओमीचंद, राजा नबकृष्ण देव वगैरह भी साथ थे.
कहानी आगे भी है लेकिन…
हमें लगता है कि हम सब कहीं न कहीं आज भी अपने अन्दर मीरजाफर को पाल कर जिन्दा रखे हुये हैँ….पन्द्रह लाख का लालच मिला तो अपने लोभ पर बुद्धि, विवेक, ज्ञान और नैतिकता का चढ़ा आवरण उतारकर कूदने लगे..और उस सड़क किनारे खड़े होकर ताँलिया बजाने वालों के अनुशरण में हर भ्रष्टाचार, अपराध, कुकर्म और बेशर्मी पर खुश होकर ताँलिया बजा रहे हैँ ! ?
विकाश सिंह ✊। जनचौक से साभार
