_______ EVM: हुजूर आते आते बहुत देर कर दी!
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने महाराष्ट्र चुनाव में लैंड स्लाईड हार के बाद EVM के खिलाफ “भारत जोड़ो यात्रा” की तर्ज पर आंदोलन करने की घोषणा की है. देर से ही मगर यह स्वागत योग्य कदम है.!
जब देश की 60% आबादी को EVM पर भरोसा ही नहीं तो इसे हटाकर बैलेट पेपर पर चुनाव कराना ही चाहिए.!
*भारत से कहीं अधिक साक्षरता और टेक्नोलॉजी में आगे वाले देश नॉर्वे, यूनाइटेड किंगडम (UK), ऑस्ट्रेलिया, इटली, आयरलैंड, कोस्टा रिका, फिलीपीन्स, ग्वाटेमाला जैसे देशों ने एक बार इस्तेमाल करने के बाद EVM को बैन कर दिया गया तो EVM से चुनाव नहीं कराने वाले देशों में जर्मनी, नीदरलैंड, पैराग्वे, फ्रांस हैं.*!
सबसे रोचक मामला जर्मनी का है जहां मात्र 2 नागरिक वहां की अदालत गये और कहा कि…
‘EVM पारदर्शी नहीं है, इसलिए उसका वोट कहां गया, उस प्रत्याशी के खाते में गया या नहीं जिसे उन्होंने वोट दिया, यह उन्हें नहीं पता.’
मात्र 2 लोगों की शिकायत पर वहां की सर्वोच्च अदालत ने EVM को असंवैधानिक कह कर जर्मनी में प्रतिबंधित कर दिया कि….
*”यदि देश के एक नागरिक को भी EVM पर भरोसा नहीं है तो यह असंवैधानिक है.”*!
मगर यह सब वहां होता है जहां देश में मात्र1 नागरिक की अहमियत होती है, जहां 60% लोग EVM के खिलाफ हों और DYC तारीख पर तारीख लगाकर EVM पर बैन मामले को खारिज कर दे, वहां ऐसी कल्पना भी नहीं की जा सकती!
EVM मामले में बहुत कुछ तथ्य आ चुके हैं और सबसे बड़ा तथ्य यह है कि…
*भारत सरकार में सचिव रहे ईएएस शर्मा के अनुसार भारत में EVM बनाने वाली कंपनी “भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड” (BEL) के निदेशक मंडल में श्री मनसुखभाई सामजीभाई खाचरिया समेत 4 लोग RSS और भारतीय जनता पार्टी के हैं.*!
ध्यान दीजिए कि मनसुखभाई सामजीभाई खाचरिया 2009 लोकसभा चुनाव में पोरबंदर (गुजरात) से भाजपा प्रत्याशी थे.!
सवाल यह है कि यह 4 लोग वहां क्या कर रहें होंगे ? जवाब है: नागपुर में बनी रणनीति को EVM में सेट कर रहे होंगे और जनता प्रत्यक्ष तौर पर जिसे वोट दे रही है, वह वोट EVM मशीन में किसके खाते में जाएगा, वह तय कर रहे होंगे.!
दरअसल VVPAT भी एक धोखा है. महत्वपूर्ण यह है कि मतगणना के दिन गणना किए जाने वाले किसी प्रत्याशी के नंबर में वोटर का वह वोट शामिल है या नहीं जो जनता ने उसे दिया है.!
इसके तमाम उदाहरण ताज़ा ताज़ा हुए महाराष्ट्र चुनाव में मिले हैं. चंद्रपुर विधानसभा में एक परिवार में 32 वोट हैं. उन सभी लोगों ने अपने घर के कैंडिडेट को वोट दिया है. फिर भी उस बूथ पर उस प्रत्याशी को जीरो वोट मिले!!
नासिक में एक उम्मीदवार को अपने घर वाले बूथ पर कथित तौर पर केवल 4 वोट मिले, जबकि उस बूथ पर उसके परिवार के 65 वोट थे!
सबसे महत्वपूर्ण यह है कि ऐसे उदाहरण भाजपा और उसके सहयोगी दलों के एक भी प्रत्याशी में नहीं मिला.!
ऐसे तमाम उदाहरण EVM पर संदेह पैदा करते हें और जर्मनी की अदालत होती तो केवल इसी आधार पर पूरे महाराष्ट्र चुनाव को ही रद्द कर देती; मगर यहां DYC जैसे लोगों की बदौलत अदालतें कंगारू कोर्ट में बदलती जा रही है.!
इसलिए अब EC, SC से कोई उम्मीद लगाकर वहां की साजिशों में फंसने की बजाय EVM के खिलाफ एक जन आंदोलन बहुत जरूरी है!
क्योंकि जब झूठ पर आधारित जन आंदोलन सफल होकर धार्मिक आस्था पैदा कर सकते हैं तो EVM के खिलाफ तो सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों सबूत हैं!
सबसे बड़ा सबूत तो यह है कि महाराष्ट्र की 95 सीटों का आंकड़ा मैच नहीं कर रहा है. अर्थात जितने वोट पड़े और जितने गिने गए, उनमें अंतर है.
इलेक्ट्रॉनिक डीवाईस में प्रोग्रामिंग और फास्ट टैग की तर्ज पर इधर का वोट उधर करने की बहुत सी संभावना है; और फ़िर उच्चतम न्यायालय VVPAT गिनने भी तो नहीं देता!
तो सवाल है कि जिस देश की जनता इतनी अनपढ़ हो कि वह अपने प्रत्याशी का नाम भी नहीं पढ़ सकती बल्कि चुनाव चिन्ह “अगड़म , बगड़म” देखकर वोट करती है, उससे इतनी हाईटेक प्रणाली से मतदान कराने का मतलब दाल में काला नहीं पूरी दाल काली है!
अगड़म चुनाव चिन्ह पर दबी EVM की बटन टों करने के बाद वोट बगड़म चुनाव चिन्ह के खाते में नहीं चला गया, इसका क्या प्रमाण है?
कहने का अर्थ यह है कि DYC के घर प्रधान सेवक ऐसे ही नहीं गये थे.
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