________ कुम्भ में सरकार ने जमकर खेला हिंदू मुस्लिम का खेल आपसी एकता तोड़ने में फिर भी रही नाकाम …!!
_______ महाकुम्भ में भगदड़ के चलते हिन्दू यात्रियों को मुस्लिम इलाकों, इमामबाड़ों, मस्जीदों में शरण लेनी पड़ी मुस्लिमों जमकर मदद की ….!!!
_______ सबाल तो करना होगा कितनी रिक्तियां खाली पड़ी हैं?
कब से खाली पड़ी हैं? पदों की संख्या बढ़ क्यों नहीं रही हैं?
नई दिल्ली. ..!!
महाकुम्भ के दौरान प्रयाग गये यात्रियों पर बड़े सख्त नियम लगाए गए थे जैसे की किस सड़क से आना है, जाना है, कहाँ खान पान करना है, कहाँ लॉज होटल में ठहरना है, कहाँ खरीददारी करनी है आदि आदि।
इनमें से अधिकतर स्पस्ट नियम यह थे की इधर-उधर यानि मुस्लिम इलाकों, मुस्लिम बाजारों , मुस्लिम दुकानों, मुस्लिम गली कूचों, या मुस्लिम रेस्टौरेंट ढाबों, या मुस्लिम अला फलां में नहीं जाना है ।
इस उददेश्य से यात्रियों को कुछ ही सडकों पर चलने को मजबूर किया गया। सारा पुलिस प्रशाशन का यही जिम्मेदारी थी की कोई यात्री इलाहबाद में सनातनी के अलावा कोई दूसरा स्वाद न चख ले या कोई अनुभव न कर ले की इलाहबाद ऐसा भी होता है।
29 जनवरी मौनी अमावस की रात हुई भगदड़ के दौरान आपदा के चलते हिन्दू यात्रियों को मुस्लिम इलाकों, इमामबाड़ों, मस्जीदों में शरण लेनी पड़ी और मुस्लिम संगठनों ने और यहाँ तक कि व्यक्तिगत तौर पर मुस्लिम लोगों द्वारा मदद की गई ।
चूंकि मुस्लिम यानि दाढ़ी टोपी वालों को सरकार ने महाकुम्भ की पवित्रता बनाए रखने के लिए तरह-तरह से प्रतिबंधित कर रखा था तो मुस्लिम समुदाय ने इसे अल्लाह का चमत्कार मानते हुए यात्रियों का जोर शोर से मदद करते हुए इस्तकबाल किया ।
जहाँ सरकार प्रशाशन यह योजना बनाए बैठे थे कि महाकुम्भ हिन्दू सनातनी यात्रियों का और ‘विधर्मी’ लोग दूर रहें, वहीं भगदड़ के कारण दोनो समुदायों में मेल मिलाप, दुआ सलाम होने लगी । इससे सरकार और प्रशासन को अपनी ‘विधर्मियों दूर रहें ‘ और ‘सनातन पवित्रता’ की परियोजना फ़ेल होती दिखाई दी। त्वरित कार्यवाही करते हुए सरकार ने पहले से किये ‘बन्दोबस्तों’ को मजबूत करते हुए दो कदम आगे बढ़ते हुए मुस्लिम इलाकों,बाजारों, गलियों की सख्त बेरिकेडिंग कर दी गई । और अधिक पुलिस तैनात करके यह सुनिश्चित किया गया कि ना सनातनी यात्री मुस्लिम इलाकों बाजारों में जा सकें या आपदा के समय कोई मदद मांग सकें ।
उस समय की सनतनी-मुस्लिम सद्भाव की वीडियो रील्स आदि ने साम्प्रदायिक हो चुकी सरकार और प्रशासन को निश्चित रुप से परेशान किया होगा। इस बरिकेडिंग से सिर्फ मुस्लिम इलाके, बाजार ही नहीं बल्कि बहुत सारे और भी इलाके सड़कें भी प्रभावित हुई थीं जिन पर हजारों तरह के समान, बाजार, खान पान, होटल आदि की सुविधाएँ थी । वे दुकानदार, व्यापारी खाली बैठे थे ।
इसके चलते इलाहबाद के 80_90% इलाके खाली सुनसान देखे गये थे जो केवल ‘मुस्लिम’ भी नहीं थे । स्वाभविक है कि वे हिन्दू थे, सनातनी भी रहे होंगे लेकीन वे नही चाहते होंगे की यात्रीगण यहाँ नहीं आएँ । मैं यकीन से कह सकता हूँ कि न उन हिन्दू दुकानदारों व्यापारियों को अपनी पवित्रता भंग होने का खतरा था और जाहिरा तौर पर उन मुस्लिम दुकानदारों व्यापारियों, इमामों को भी अपनी पवित्रता भंग होने का खतरा नहीं था ।
सांस्कृतिक तौर पर प्रयागराज सनातनीयों का और इलाहाबाद मुस्लिमो का बनाया गया। गंग ओ जमुनी संस्कृति को इलाहाबाद में जो चोट पहुंचाई गई उसी का परिणाम है की आज 50-60 करोड़ यात्रियों की आमद के दावे के बावजूद कमतर जी एस टी का रोना रोया जा रहा है।
अन्य अस्थाई रोजगारों जैसे नाविको, मोटरसाइकिल चलाने वाले युवकों को लुटेरे अपराधी बताया गया, उन पर दंडात्मक कार्यवाही की गई, उनकी सैकडों मोटरसाइकिलें जब्त की गईं । सैकड़ों सरकारी विभागों के बड़े-बड़े पंडालों में ठेकेदारों के लिए काम कर रहे युवकों के दिहाडी मजदूरी के मामले लटके पड़े हैं । कुछ माफिया पैदा करके महाकुम्भ को सफल होने का दावा किया जा रहा है ।
महाकुंभ के समापन पर इसे धार्मिक- आध्यत्मिक पर्यटन का केंद्रीय बिन्दु बताकर आगामी सभी धार्मिक अध्यत्मिक आयोजनों को देश के लिये आर्थिक प्रगति का स्रोत बनाने का दावा किया गया। निस्संदेह जब सरकार ‘आपदा में अवसर ‘ का सिद्धांत बनाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है तो आस्था-धर्म- आध्यात्मिक स्नान,व्रत, त्योहारों, मेलों का आयोजन करके जी एस टी की वृद्धि का लक्ष्य बनाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।
लेकिन इस धार्मिक-आध्यात्मिक व्यापार में रोजगार सृजन की बात कहीं भी सुनाई नहीं पड़ी। बेरोजगार युवकों को दो महीने चाय पकौड़े, फुल माला, मोटरसाइकिल पर सवारी ढोने, गुटका खैनी, नीम्बू पानी बेचने आदि के अस्थाई ‘रोजगार ‘ के बुलबुले से निकल कर स्थाई रोजगार प्राप्त करने के लिए भी अपनी हदें पार करनी होगी ।
कितनी रिक्तियां खाली पड़ी हैं?
कब से खाली पड़ी हैं?
पदों की संख्या बढ़ क्यों नहीं रही हैं?
भर्ती परीक्षाओं के परिणाम आने में इतने साल क्यों लगते हैं?
बार बार परीक्षाएँ लीक क्यों होती हैं?
भर्तियां अस्थाई/संविदा आधार पर क्यों होती हैं, स्थाई क्यों नहीं?
उपरोक्त जैसे अनेकों सवाल आज युवा वर्ग के सामने खड़े हैं । धर्म, सम्प्रदाय, जाति राजनीति से ऊपर उठकर ये सवाल करना पड़ेगा । आस्था धर्म व्रत त्यौहार मेला स्नान पर सरकार के व्यापार करने से सबको स्थाई रोजगार नहीं मिलेगा, यह समझना जरुरी है।……. डॉ.अरुण कुमार……!!
