______ झूठ की नींव पर बनी कंपनी की इमेज…!!
_____यह कोई आम घोटाला नहीं था यह एक रणनीतिक चाक-चिक्कन लूट थी ..!!
_____सरकारी चोले में कॉर्पोरेट तिजारत, घोटालों का क्लासरूम, और मोदी ब्रांड के “विकास” की हड्डी तक चूसने वाली कथा…!!
नई दिल्ली. . !!!
GSPC घोटाला: जब एक सरकारी कंपनी को चुपचाप चूसकर फेंका गया, और प्रधानमंत्री ने निगाह फेर ली
यह कोई आम घोटाला नहीं था।
यह एक रणनीतिक चाक-चिक्कन लूट थी — सरकारी चोले में कॉर्पोरेट तिजारत, घोटालों का क्लासरूम, और मोदी ब्रांड के “विकास” की हड्डी तक चूसने वाली कथा।
Gujarat State Petroleum Corporation यानी GSPC को एक “गैस खोजने वाली हीरो कंपनी” बताकर राजनीतिक मंचों पर बेचा गया।
अंदर ही अंदर, यह कंपनी एक ऐसी बर्बादी की लैब बन चुकी थी जहाँ—
फर्जी कंपनियों को अरबों की हिस्सेदारी मिली, झूठे गैस भंडार दिखाकर कर्ज खींचे गए, और जब कर्ज लौटा न जा सका तो ONGC जैसी सार्वजनिक कंपनी को बलि का बकरा बना दिया गया।
1. झूठ की नींव पर बनी कंपनी की इमेज:
2005 के आसपास मोदी सरकार ने दावा किया कि GSPC ने KG बेसिन में 2 ट्रिलियन क्यूबिक फीट गैस खोज ली है।
यानी “भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता का नया अध्याय”।
लेकिन ये सिर्फ एक बयान था — न वैज्ञानिक डेटा, न कमर्शियल पुष्टि।
फिर भी मोदी ने इसे भाषणों में भुनाया।
यानी शोर ब्रांडिंग का, और अंदर से कंपनी के खातों में गैस नहीं, सिर्फ उधारी भरी जा रही थी।
2. मॉरीशस से आई “भूत कंपनी”: Geo Global Resources
अब आता है असली खेल।
GSPC ने गैस खोजने के लिए Geo Global Resources नामक एक दिखावटी कंपनी को साझेदार बनाया।
ये कंपनी तो महज़ 6 दिन पहले मॉरीशस में रजिस्टर्ड हुई थी, और उसका कोई तकनीकी या आर्थिक अनुभव नहीं था।
फिर भी उसे 10% की हिस्सेदारी मुफ्त में दे दी गई।
क्यों? किसके इशारे पर? किसलिए ये खैरात?
जवाब में सिर्फ चुप्पी है — शायद इसलिए क्योंकि जो नाम सामने आते, वे राजनीतिक स्वामीभक्ति की हदें पार कर चुके होते।
3. कर्ज का चूसना:
GSPC ने बैंकों से लगभग ₹20,000 करोड़ रुपये का कर्ज उठाया।
लेकिन न तो प्रोडक्शन हुआ, न गैस निकली।
फिर ये पैसा गया कहाँ?
भारी-भरकम सैलरी वाले अफसरों की फौज रखी गई
फर्जी बिलिंग और दिखावटी खर्च
टेंडर और सप्लायर चेन में अपनों को सेट करना
पैसे को “ऑपरेशनल लॉस” बता कर धीरे-धीरे निकालना
यानी एक “ब्लीडिंग मशीन” बना दी गई, जहाँ पैसा अंदर से रिसता रहा और बाहर सिर्फ दिखावे का विकास झलकता रहा।
4. जब सब फेल हो गया, तो बुलाई गई ONGC — देश की लुगाई
जब नुकसान संभालना मुश्किल हो गया,
तो केंद्र सरकार ने ONGC से कहा:
“इस कंपनी को खरीद लो।”
मतलब, जनता की और पब्लिक सेक्टर की सबसे बड़ी तेल कंपनी को इस गटर में उतार दिया गया,
ताकि गुजरात मॉडल का कर्ज और लूट साफ़-साफ़ दिखे ही नहीं।
ONGC को ₹8000 करोड़ का घाटा झेलना पड़ा।
पर घोटालेबाज अफसरों को किसी ने सज़ा नहीं दी — बल्कि कुछ तो बाद में PMO में जगह बना गए।
5. चुप्पी का संयोग और मीडिया का बिक जाना
क्या आप जानते हैं कि इस घोटाले पर Arun Shourie, Raghuram Rajan, और कई स्वतंत्र लेखकों ने आवाज़ उठाई?
पर जैसे ही मामला उठने लगा, NDTV जैसे चैनल पर दबाव पड़ा, EPW जैसे जर्नल की रिपोर्ट्स गायब की गईं,
और मुख्यधारा मीडिया ने “बिकास” के नाम पर चुप्पी ओढ़ ली।
यह घोटाला सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि लोकतंत्र के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा है।
यह कहानी बताती है कि:
कैसे सत्ता में बैठकर सरकारी कंपनी को बंधक बनाया जाता है
कैसे फर्जी कंपनियों के जरिए घोटाले होते हैं
और कैसे पूरा सिस्टम, मीडिया और नियामक संस्थाएं उस लूट में सहभागी बन जाते हैं
और सबसे ज्यादा शर्म की बात यह
कि इस लूट के मास्टरमाइंड आज भी “देशभक्ति” के नाम पर वोट मांगते हैं।
