- _____ भारतीय मीडिया की गिरती साख पर जस्टिस काटजू का करारा प्रहार..!!
____ भारतीय मीडिया 143 करोड़ लोगों के असली मुद्दों से दूर ..!!______ टीआरपी भेदी पत्रकारिता भूख, बेरोज़गारी और शिक्षा से ज़्यादा ज़रूरी बना दी गई है अटकलें “शर्मनाक और धंधेबाज़” बन चुका है भारतीय मिडिया..: जस्टिस काटजू
_________ क्या लोकतंत्र में जनहित के मुद्दे अब टीआरपी से तय होंगे…? जस्टिस
नई दिल्ली. .!!
मार्कंडेय काटजू ने उपराष्ट्रपति धनखड़ के इस्तीफे पर भारतीय मीडिया की अटकलों और ‘मिर्च-मसाला’ पत्रकारिता की कड़ी आलोचना की है..! उन्होंने सवाल उठाया कि क्यों असली मुद्दे — भूख, बेरोजगारी और स्वास्थ्य — मीडिया की प्राथमिकता नहीं हैं..! दिनभर की बड़ी ख़बरें हिंदी बुलेटिन उपराष्ट्रपति के इस्तीफे की अटकलों में उलझा मीडिया नई दिल्ली, सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश, एवं प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे पर मीडिया कोहराम की तीखी आलोचना की है..! उन्होंने अंग्रेज़ी में लिखे लेख में जस्टिस काटजू लिखते हैं कि हाल ही में भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद से देश का मीडिया तरह-तरह की कहानियों और कयासों से भरा पड़ा है। कोई कह रहा है कि यह स्वास्थ्य कारणों से हुआ, जैसा कि उन्होंने कहा, तो कोई इसका कारण राजनीतिक दबाव या “ऊपर से आदेश” बता रहा है..!
राहुल-खरगे का तगड़ा वार : मोदी ट्रंप की गुलामी करना चाहते हैं..!टीवी चैनलों और यूट्यूब पेजों पर बहसें चल रही हैं, शीर्षक चमक रहे हैं, विश्लेषक सामने बैठे हैं — मानो यह मामला भारत के 143 करोड़ लोगों की प्राथमिकता बन गया हो असली सवाल क्या ये मुद्दा वाकई आम जनता से जुड़ा हैं..?
जस्टिस काटजू इस पूरे मीडिया उन्माद को “मिर्च-मसाला” बताते हैं ऐसा मसाला जो मीडिया की टीआरपी बढ़ाता है, पत्रकारों और यूट्यूबर्स को कमाई देता है, लेकिन आम लोगों के जीवन से इसका कोई लेना-देना नहीं..! बिहार में मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण पर सियासी संग्राम: विपक्ष का आरोप — वोटर लिस्ट में गड़बड़ी और लोकतंत्र की हत्या उन्होंने लिखा है: “भारत की 143 करोड़ की आबादी में करोड़ों लोग आज भी घोर गरीबी में जी रहे हैं, बेरोज़गारी चरम पर है, बच्चों में कुपोषण की स्थिति भयावह है ग्लोबल हंगर इंडैक्स के अनुसार हर दूसरा बच्चा कुपोषित है खाद्य वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही हैं, और स्वास्थ्य व शिक्षा की हालत तो कहने लायक भी नहीं। क्या इन मुद्दों पर चर्चा हो रही हैं..?”
टीआरपी की चक्की में पिसता लोकतंत्र काटजू का यह सवाल सिर्फ एक आलोचना नहीं, बल्कि भारतीय मीडिया के मौजूदा चरित्र का आईना है..!
गुरदीप सिंह सप्पल का तीखा प्रहार: “धनखड़ कठपुतली थे, मंच संघ का था” उनका मानना है कि जो मुद्दे “बिकते नहीं”, वे अब मीडिया की प्राथमिकता नहीं हैं भूख नहीं बिकती, बेरोजगारी नहीं बिकती, किसानों की आत्महत्या नहीं बिकती — लेकिन उपराष्ट्रपति के इस्तीफे पर अटकलें बिकती हैं “शर्मनाक और धंधेबाज़ बन चुका है मीडिया” जस्टिस काटजू कहते हैं कि अधिकांश मीडिया अब न पत्रकारिता कर रहा है, न जनसेवा वह अब धंधा बन चुका है। उनके अनुसार यह मुनाफाखोरी, सनसनी और सतही बहसों का अखाड़ा बन चुका है, जहाँ “जो दिखता है, वही बिकता है” का सिद्धांत ही सब कुछ है। सवाल ये नहीं कि उपराष्ट्रपति ने क्यों इस्तीफा दिया, सवाल ये है कि… भारत के गांवों में लाखों बच्चे भूखे पेट क्यों सोते हैं..?
क्यों देश के युवाओं को डिग्री के बाद भी नौकरी नहीं मिलती.? क्यों महिलाएं सुरक्षा और स्वास्थ्य दोनों से वंचित हैं? क्यों गरीब आदमी सरकारी अस्पताल में दवा तक नहीं पा पाता.? और क्यों मीडिया इन सवालों से मुंह मोड़ता है? मीडिया को आइना दिखाने की ज़रूरत जस्टिस काटजू की यह टिप्पणी केवल उपराष्ट्रपति के इस्तीफे पर नहीं है यह पूरे मीडिया तंत्र की नब्ज पर उंगली रखने जैसा है यदि मीडिया वास्तव में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, तो उसे सबसे पहले जनता की आवाज़ बनना होगा न कि सत्ता की गोदी में बैठकर “मिर्च-मसाला” परोसना. ..!!!
