संसद भवन परिसर में आज के इस दृश्य के बाद क्या लगता है आपको कि ये मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण इसी रूप में हो सकेगा…?
क्या विपक्ष की एकजुट आवाज़ को दबाकर भी लोकतंत्र की जड़ में मट्ठा डालने में सरकार क़ामयाब हो जाएंगी…?
अगर फिर भी मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण का काम नहीं रुका, तो फिर कुछ बचेगा नहीं. सरकार ही जब अपना वोटर चुन रही होगी, फिर चुनावों के क्या मायने बचेंगे. ..?
