________आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता – फिर चाहे वो मालेगांव हो या पहलगाम…!!
नई दिल्ली. .!!
एक ओर देश पहलगाम में हुए आतंकी हमले से ग़म और ग़ुस्से में डूबा है, आतंकवादियों के खिलाफ़ देशव्यापी आक्रोश है, इस मामले की उच्चस्तरीय जाँच कर इन आतंकियों और इनके पीछे खड़ी ताकतों को जड़ से उखाड़ने की माँग एक सुर में उठ रही है।
वहीं दूसरी ओर 2008 के मालेगांव बम धमाके के मामले में जांच प्रक्रिया ने एक नया मोड़ ले लिया है।
NIA ने मुंबई की विशेष अदालत में दायर अपनी अंतिम दलीलों में मालेगांव विस्फोट मामले में 7 आरोपियों को फांसी की सज़ा देने की मांग की है।
ये महज़ आरोपी नहीं—बल्कि सत्ता, सेना और हिंदुत्ववादी विचारधारा से जुड़े अहम चेहरे हैं: BJP सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित, मेजर रमेश उपाध्याय, सुधाकर द्विवेदी, सुधाकर चतुर्वेदी, अजय राहिरकर और समीर कुलकर्णी।
इन सभी का संबंध हिंदुत्ववादी संगठन ‘अभिनव भारत’ से जुड़ा हुआ बताया गया है।
29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगांव में एक मस्जिद के पास खड़ी मोटरसाइकिल में लगाए गए बम के धमाके में 6 लोग मारे गए और 100 से ज़्यादा घायल हुए।
NIA की चार्जशीट के मुताबिक़, यह हमला “हिंदू राष्ट्र” की विचारधारा से प्रेरित एक संगठित भगवा आतंकी नेटवर्क द्वारा रचा गया था।
जांच के दौरान दर्ज 323 गवाहों में से 32 ने अदालत में अपने बयान पलट दिए।
यह दर्शाता है कि इन गवाहों पर, और जाँच प्रक्रिया में शामिल लोगों पर कितना जबरदस्त राजनीतिक दबाव डाला गया होगा।
फिलहाल केस मुंबई की विशेष NIA अदालत में विचाराधीन है।
न्यायाधीश ए.के. लाहोटी ने फैसला सुरक्षित रख लिया है, जो 8 मई को सुनाया जाएगा।
लेकिन हम सब जानते हैं कि आज न्यायपालिका पर सत्ता का प्रभाव कितना गहरा हो चला है।
यह समझना कठिन नहीं कि न्यायाधीश पर कितना दबाव होगा।
और अगर विशेष अदालत से न्याय मिल भी जाए, तो जैसे ही यह मामला बॉम्बे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में जाएगा, यह आशंका वाजिब है कि सत्ता से जुड़े कुछ चेहरों को ‘राजनीतिक संरक्षण’ का कवच मिल सकता है।
पर सच यही है—NIA की चार्जशीट, फॉरेंसिक सबूत, और गवाहों के बचे हुए बयान यह साबित करते हैं कि यह एक सुनियोजित आतंकी हमला था।
अब देखना यह है—क्या अदालत न्याय के साथ खड़ी होगी या सत्ता के साथ?
अब आइए कश्मीर की तरफ़—जहां हाल ही में पहलगाम में आतंकवाद ने फिर से अपनी खूनी शक्ल दिखाई।
इस हमले में 26 निर्दोष पर्यटक मारे गए। रिपोर्ट्स के मुताबिक, हमलावरों ने पहले धर्म पूछा, फिर गोलियां चलाईं।
इस हमले की ज़िम्मेदारी एक संगठन ‘कश्मीर रेजिस्टेंस फोर्स’ ने ली है—जिसे लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा एक फ्रंट माना जाता है।
अब ठहरिए और सोचिए—क्या आतंकवाद सिर्फ एक धर्म की उपज है?
मालेगांव में भगवा आतंक,
पहलगाम में इस्लामी आतंक,
धर्म अलग, लाशें वही। विचारधारा अलग, नफ़रत वही।
आतंकी न हिंदू होता है, न मुसलमान—वो सिर्फ़ एक हत्यारा होता है।
इन दोनों घटनाओं ने हमारे सामने एक आईना रख दिया है—जिसमें साफ़ दिखता है कि…..!!
आतंकवाद का न कोई धर्म होता है, न जात, न नस्ल।
उसका एक ही चेहरा है—ख़ून और डर।
________अब वक्त है कि हम धर्म नहीं, अपराध पहचानें। आतंकियों को उनके धार्मिक पहचान से नहीं बल्कि उनके मंशा और मकसद से पहचानें।—धर्मेन्द्र आज़ाद
