आज के समय में जो साहित्य लेखन हो रहा है वह मंचों तक सीमित होकर रह गया है जो साहित्य सिर्फ लोगों को हंसाने गुदगुदाने का काम कर रहा है समाज के परिवर्तन के लिए राष्ट्र की एकता के लिए आपसी भाईचारा काम करने के लिए इस साहित्य में कोई भाव नहीं है जब तक साहित्य में समाज का दर्द और राष्ट्र की एकता का भाव नहीं होगा तब तक वह साहित्य दीर्घजीवी भी नहीं बन सकता
साहित्य को समाज की बदलाव का दर्पण कहा गया है परंतु दुर्भाग्य है आज की अधिकांश साहित्यकार साहित्य की विषय वस्तु इस तरह की खोज कल लाते हैं जिससे लोग हंसते रहे उनका परिवर्तन कामी साहित्य लिखने से कोई लेना देना नहीं है साहित्य रूसी क्रांति के दौरान परिवर्तन में सहायक सिद्ध हुआ था!
आज साहित्य और साहित्यकार की कलम दोनों की धार कुंद होती दिख रही है जो समाज के नवनिर्माण के लिए शुभ नहीं है अभी भी वक्त है हंसी चुटकुले छोड़कर साहित्य को समाज का दर्पण बनाने के लिए दीर्घ जीबी साहित्य लिखने की दिशा में साहित्यकार कलम चलाएं तो निश्चित रूप से एक बड़ा परिवर्तन हो सकता है
