________ प्रकृति ही ईश्वर है. यही प्रकृति यही संतुलन है और यही ईश्वर है.!
*Shambhunath Shukla*
हमारे गांधी स्मारक इंटर कॉलेज में बायलॉजी के एक लेक्चरर थे आरके गुप्ता. वे तब युवा ही थे लेकिन चाँद उनकी गंजी थी. वे सदैव खोये-खोये रहते किंतु वे परम विद्वान थे. देखते ही लगता न्यूटन या जेम्स वाट जैसा कोई वैज्ञानिक है या आला दर्जे का कोई दार्शनिक. वे जाति से वैश्य थे और एक बड़े महाजन परिवार से थे फिर भी तुच्छ वेतन वाली यह नौकरी उन्होंने की. यह सबके लिए आश्चर्य का विषय था. घर पर अनेक गाड़ियाँ किंतु वे चार मील पैदल चल कर कॉलेज आते. !
उस समय अधिकतर मास्टर निम्न मध्य वर्ग के ब्राह्मण अथवा कायस्थ या ठाकुर होते थे. ये सब साइकिल से आते, सिवाय एक ब्रह्मा कुमारी संप्रदाय के तिवारी जी को छोड़ कर, जो फियेट कार से आते. एक आरके शुक्ला थे जो शहर की नामी एक ज्वैलर्स फैमिली से थे, वे पीले रंग की वेस्पा से आते. वे फिजिक्स के लेक्चरर ब्रह्म दत्त दीक्षित के सहायक थे
मैं तब सातवें दरजे में था. एक दिन हमारे साइंस मास्टर नहीं आए तो उन्हें हमारी कक्षा में भेज दिया गया. वे लेक्चरर थे पर उस दिन उन्हें जूनियर कक्षा दी गई शायद इसलिए कि वह पोंगा पंडित नहीं थे और प्रिंसिपल के चंपू भी नहीं. !
कक्षा में वे जैसे ही घुसे तो सब बच्चे सहम गए! ऐसा लगा कि साक्षात होमी जहांगीर भाभा हमारी क्लास में आ गए! इतना बड़ा लेक्चरर हमें पढ़ाने आ जाए, कल्पना से परे था. !
उन्होंने उस दिन जो पढ़ाया उसे सुन कर सब बच्चे सहम गए, मगर मैंने तल्लीनता से उन्हें सुना और आत्मसात् किया. आज भी मैं उन्हीं सिद्धांतों पर चलता हूँ. !
उन्होंने हमें ऊर्जा के सिद्धांत के बारे में पढ़ाया. उन्होंने चाक से बोर्ड पर एक गोला बनाया और बोले, मान लो यह ऊर्जा है. यही हमें संचालित करती है. एक तरह से यह प्रकृति या नेचर है. और यह सदैव संतुलन से चलती है.!
हर जीवधारी तथा पर्वत, नदियाँ, जंगल से लेकर यह ब्रह्मांड तक इसी से संचालित है.
सोचो, यदि चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर चक्कर काटने में थोड़ा पृथ्वी की तरफ़ झुक जाए तो गुरुत्वाकर्षण के चलते वह पृथ्वी से टकराएगा, पूरी पृथ्वी नष्ट हो जाएगी. पृथ्वी नष्ट हुई तो वह सूर्य से जा चिपटेगी. सूर्य जो अग्नि का गोला है, वह उसे भस्म कर देगी..ऐसी ज्वाला उठेगी कि प्रकृति के सिद्धांत से चलते सारे ग्रह परस्पर जल उठेंगी और हमारा सौर मंडल नष्ट! पर ऐसा कभी न हुआ न होगा.
_________यही प्रकृति यही संतुलन है और यही ईश्वर हैं!.
पता नहीं 12-13 वर्ष के बच्चे इसे कितना समझे होंगे मगर मैंने पूरा समझा. जाना कि ईश्वर एक अंधकार है, अज्ञान है. न कहीं खुदा है न गॉड है. न कहीं मंदिर, न कहीं मस्जिद, न चर्च; जो है वह प्रकृति है.
गुरुत्वाकर्षण है और सब जुड़े हुए हैं. इसलिए मैं विचलित नहीं होता.
उन्होंने यह बताया कि प्रकृति का हर प्राणी अहम है और उसे बनाये रखना हमारी जिम्मेदारी. मच्छर से लेकर हाथी तक परस्पर इसी सिद्धांत से संचालित हैं. पहाड़ और नदियाँ भी. इसलिए बच्चों, कभी किसी जीवधारी को नष्ट न करना. एक को नष्ट किया तो दूसरा भी नष्ट होगा. जब कोई बढ़ता है तो प्रकृति स्वतः उसको बराबर कर देती है. हमारा भोजन इसी आधार पर चलता है.
(मेरे संस्मरणों का एक हिस्सा)
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