______ कुम्भ में पाइपलाइन बिछाने का काम करने वाले नाबालिग़ मज़दूर की मौत
इलाहाबाद !
इलाहाबाद के महाकुम्भ मेले में एक दिल दहलाने वाली घटना हुई है। एक बीमार नाबालिग़ मज़दूर की लगातार काम लिए जाने और समय पर समुचित इलाज़ ना मिल पाने की वजह से मौत हो गयी है।
लतीफपुर गाॅंव का रहने वाला गोरेलाल अपने बूढ़े मां-बाप का इकलौता लड़का था। कुम्भ में पाइपलाइन बिछाने का काम कर रहा था। इस भीषण ठण्ड में बिना सुरक्षा उपकरणों और काम की बेहद कठिन परिस्थितियों के कारण वह ठण्ड की चपेट में आ गया था। ठण्ड लगने की वजह से बीमार हुए इस मज़दूर का इलाज करवाने के बजाय कुम्भ में ठेकेदारों ने उससे दिन रात काम करवाया जिसके कारण वह काम के दौरान ही बेहोश होकर गिर पड़ा और कुछ समय बाद उसकी मौत हो गयी। ठेकेदार के इस कुकर्म को छिपाने के लिए पुलिस ने शव को छिपा दिया और परिजनों को बिना सूचना दिए लाश तक को जला दिया।
एक तरफ जहाँ मीडिया चैनल्स में “भव्य” महाकुम्भ का प्रचार ज़ोर-शोर से चल रहा है और धीरेन्द्र शास्त्री जैसे ढोंगियों के “हिन्दू राष्ट्र” की गर्जना दिखाई जा रही है। वहीं इस चमक-दमक के पीछे मुनाफ़े के लिए हो रही ठण्डी हत्याओं पर सन्नाटा छाया हुआ है। 17 वर्षीय इस नाबालिग़ मज़दूर की यह मौत धनपशुओं की रक्तपिपासिता का परिणाम है जिसमें प्रशासन और सरकार भी भागीदार है।
कुम्भ में होने वाली यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी कुम्भ की तैयारी के दौरान सरायइनायत के जगबंधन गांव में हाइटेंशन तार खींचने के दौरान टावर के गिरने से 7 मज़दूर बुरी तरह घायल हो चुके थे। जिसमें सलीम नाम के एक मज़दूर का पैर भी कट गया था और अन्य 6 लोग (कासिम, अब्दुल, अनिरुद्ध, आमिर, पुतुल शेख़, छुट्टन) बुरी तरह घायल हो गये थे। लेकिन इन्हें न ढंग का इलाज़ मिला और न ही कोई मुआवजा। ऊपर लिखे नामों को पढ़कर साफ़ पता लगाया जा सकता है कि कुम्भ को सजाने और छोटे से लेकर बड़े इन्तज़ाम करने वाले हिन्दू-मुस्लिम दोनों धर्मों के मज़दूर ही हैं। लेकिन कुम्भ मेले में जिस तरह से धीरेन्द्र शास्त्री भड़काऊ बयान दे रहा है कि “जिस दिन ‘गुजरात के लोग’ इसी तरह संगठित हो जायेंगे उस दिन हिन्दूस्तान तो क्या पाकिस्तान भी हिन्दू राष्ट्र बनवायेंगे”। धीरेन्द्र शास्त्री के इस बयान को मीडिया में खूब चलाया जा रहा है, “जिहादियों के ख़िलाफ़ युद्ध” बताया जा रहा है। और कुम्भ मेले में आतंकवादी पकड़ने के नाम पर फर्ज़ी ख़बर चलाकर मुस्लिमों को टारगेट किया जा रहा है। इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि यह कुल मिलकर जनता के बीच आपसी नफ़रत पैदा करने के लिए किया जा रहा है। और इसकी आड़ में मज़दूरों मेहनतकशों की ठण्डी हत्यायें की जा रही है।
वैसे तो किसी भी लोकतान्त्रिक देश में सरकार को किसी भी धार्मिक आयोजन में हिस्सेदारी नहीं करनी चाहिए। धर्म का राजनीति में कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए लेकिन यहाँ भाजपा की मोदी-योगी सरकार कुम्भ के आयोजक की भूमिका निभा रही है। इसके जरिये जहाँ एक तरफ़ संघ परिवार और उसके अनुषांगिक संगठन धार्मिक उन्माद फैला रहे हैं और पिछले 10 सालों के भाजपा के कुकर्मों को साफ करने में लगे हुये हैं वहीं दूसरी तरफ़ इसका फायदा उठाकर तमाम धनपशु मज़दूरों मेहनतकशों की जान की क़ीमत पर भी मुनाफ़ा लूटने में लगे हुए हैं। जिसकी कीमत आम मेहनतकश आबादी जान गँवा कर चुका रही है।
फ़ासीवादी दमन-ठेकेदार-पूँजीपति और प्रशासन का यह गंठजोड़ आज मेहनतकशों पर इसलिए हावी है क्योंकि मेहनतकश-मज़दूर संगठित नहीं हैं। हमारे पास अपने अधिकार और कई बार जान बचाने के लिए एक ही रास्ता बचा है कि हम अपनी वर्गीय एकता क़ायम करें।
