_________संयुक्त किसान मोर्चा,हरियाणा के पदाधिकारियों ने विधायक आदित्य चौटाला को सौपा मांग पत्र. ..!!!
_______ कृषि विपणन पर राष्ट्रीय नीति फ्रेमवर्क के मसौदे के संबंध में संयुक्त किसान मोर्चा,हरियाणा का आख्यान….!!!
चंडीगढ़ / हरियाणा
केंद्र सरकार के कृषि एवं कल्याण मंत्रालय की ओर से उपरोक्त विषय पर एक मसौदा 25 नवंबर,2024 को सार्वजनिक रूप से जारी किया गया था । इसमें राज्य सरकारों व पब्लिक से उनके सुझाव मांगे गए थे बाद में हमें मीडिया के माध्यम से यह मालूम हुआ कि आपको राष्ट्रीय राज्य कृषि विपणन परिषद के अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंप गई है । संयुक्त किसान मोर्चा हरियाणा जो कि किसानों के मुद्दों और कृषि संबंधी नीतियों को लेकर 4 साल से अभियान एवं आंदोलन चलाने का एक साझा मंच है। इसी मंच के नेतृत्व में वर्ष 2020-21 में तीन कृषि कानूनों को वापस करवाने एवं अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर 380 दिन का ऐतिहासिक किसान आंदोलन चलाया गया। इसके फलस्वरूप ही केंद्र सरकार को ये तीन कृषि कानून वापस लेने पड़े ।
9 दिसंबर 2021 को केंद्र के कृषि मंत्रालय की ओर से एक लिखित संदेश भी एसकेएम के नाम भेजा गया था। इसमें न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसल खरीद की कानूनी गारंटी ,बिजली बिल संशोधन को सभी संबंधित पक्षों से परामर्श करके ही संसद के पटल पर रखने,वायु प्रदूषण कानून से खेती को बाहर रखने आदि 6 बिंदुओं पर आश्वाशन दिए गए थे । उसी के उपरांत हमने 11 दिसंबर 2021 को आंदोलन के निलंबन की घोषणा की थी परंतु अफसोस का विषय है कि केंद्र व राज्य सरकार अपने आश्वासनों से पीछे हट गई जिसके कारण तब से लेकर आज तक किसानों को अपनी लंबित मांगों के लिए विभिन्न स्वरूप के आंदोलन करने पड़ रहे हैं जिससे आप भी परिचित हैं। यह अपने आप में एक विडंबना ही है कि जिस समय देश के किसान अपनी कंगाली से उभरने के लिए C2+50% के फार्मूला पर आधारित एमएसपी की कानूनी गारंटी प्राप्त करने के लिए जूझ रहे हैं उसी समय केंद्र सरकार एक ऐसा प्रतिगामी मसौदा जारी कर देती है जिसमें किसानों की ज्वलंत समस्याओं का उल्लेख मात्र भी नहीं है।
35 पृष्ठों के इस मसौदे का शीर्षक ही “एग्रीकल्चर मार्केटिंग की योजना फ्रेमवर्क की- राष्ट्रीय नीति” रखा गया है । कृषि विपणन राज्यों का विषय है परंतु एकतरफा तौर पर उसे पुनर्गठित करने का कदम राज्यों के संवैधानिक अधिकारों का अतिक्रमण करता है ।
हम आपको शुरू में ही इस तथ्य से अवगत करवाना जरूरी समझते हैं कि संयुक्त किसान मोर्चा उपरोक्त दस्तावेज का गहन अध्ययन और सघन बहस करने के उपरांत इस मसौदे को नामंजूर करते हुए इसे वापस लिए जाने की मांग पर देश भर के सभी संसद सदस्यों को ज्ञापन प्रेषित कर चुका है । इसके अतिरिक्त 4 जनवरी 2025 को टोहाना में आयोजित एक विशाल महापंचायत और 9 जनवरी को मोगा में हुई किसान महापंचायत में एक स्वर से उपरोक्त मसौदे को तीन कृषि कानूनों से भी ज्यादा घातक घोषित करते हुए इसे वापस लेने की मांग कर चुके हैं।
बहरहाल चूंकि आप एक जनप्रतिनिधि के अलावा परिषद के प्रमुख हैं हम आपसे अपनी समझ सांझा करनी जरूरी समझते हैं । हरियाणा व पंजाब जैसे प्रदेशों में “कृषि उत्पादन मार्केट कमेटी एक्ट – 1939” जब अस्तित्व में आया उससे पहले साहूकार और महाजनों द्वारा किसानों का भयंकर शोषण किया जाता था । उन्हें कर्ज के जंजाल में फंसा कर उनकी जमीन ,पशु और घर कुड़क कर लिए जाते थे। इस दयनीय स्थिति के खिलाफ संयुक्त पंजाब में आजादी से पहले व्यापक किसान आंदोलन हुए । तब यूनियनिस्ट पार्टी की सरकार में राजस्व मंत्री चौधरी छोटू राम की पहलकदमी से मंडी कानून और कुड़की विरोधी कानून बने। इससे किसानों को भारी राहत मिली और मनमर्जी बंद हुई ।
1__ इन अनाज मंडियों में तमाम तरह की कमी बता कर जो मसौदा लाया गया है उसका निशाना मंडियों पर ही है । इसमें साफ तौर पर प्राइवेट मंडियों को स्थापित करने की जोरदार सिफारिश है इसमें साफ लिखा गया है कि “ओपन खरीद” पर कोई फीस नहीं लगेगी जाहिर है किसान थोड़े से लालच में उधर ही जाएगा परंतु जब मंडी चौपट हो जाएगी तो किसान अपना उत्पाद बेचने को प्राइवेट कंपनियों के रहमो कर्म पर निर्भर होगा ।
2) यह “ठेका प्रणाली की खेती – कान्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग” को लागू करने की बात करता है जोकि निरस्त किए गए तीन कृषि कानूनों में भी थी । FPO के जरिए कॉन्ट्रैक्ट खेती को लागू करने की सिफारिश है जिससे छोटे व मंझौले किसान उजड़ जाएंगे ।
3) यह ड्राफ्ट निजी कंपनियों को थोक में खरीद और थोक में भंडारण की इजाजत देता है । तीन कानूनों में भी “आवश्यक वस्तु अधिनियम” को निरस्त करने का प्रावधान था इससे साइलो और बड़े भंडारों में असीमित भंडारण द्वारा मनमर्जी से खाद्यान्नों के भाव निर्धारित होंगे और खाद्य सुरक्षा छिन्न भिन्न होगी । सार्वजनिक वितरण प्रणाली भी निष्प्रभावी हो जाएगी।
4) इसमें मूल्य चेन केंद्रित ढांचे की बात की गई है और “एकीकृत राष्ट्रीय मार्केट” स्थापित करने की सिफारिश है जिस पर निश्चित रूप से बड़ी मोनोपोली पूंजी का ही वर्चस्व होना लाजमी है । इसमें राज्यों के बीच सभी तरह के अवरोध हटाकर कृषि उत्पाद के निर्बाध आवागमन के माध्यम से पूरा व्यापार कुछ हाथों में सिकुड़ जाएगा।
5) इस ड्राफ्ट में कंपीटीशन के नाम पर किसान को अपने उत्पाद को “कहीं भी बेचने की छूट” जैसी थोथी बात है यदि कंपीटिशन करना है तो निजी कंपनियों को वर्तमान में मंडी में जाकर खरीदने से कौन रोक रहा है ?
उदाहरण के तौर पर केरल के रबड़ उत्पादकों से रबड़ कंपनियां कंपीटिशन करके ऊंचे भाव पर रबड़ क्यों नहीं खरीद रही? वहां के रबड़ उत्पादकों को लगातार रबड़ के दाम गिरने से घाटा झेलना पड़ रहा है और आंदोलन के अलावा सुप्रीम कोर्ट में भी लड़ना पड़ रहा है।
6) ड्राफ्ट कहता है कि “भाव इंश्योरेंस” की व्यवस्था से भाव निश्चित भाव से कम नहीं होने दिया जाएगा । उदाहरण दिया है प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का इस योजना के तहत बीमा कंपनियों की धक्का शाही किसी से नहीं छिपी है यदि सरकार भाव देने पर इतनी गंभीर है तो पूरे मसौदे में न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी का उल्लेख तक क्यों नहीं ? क्या कॉर्पोरेट अपने मुनाफों को किसानों से साझा करने को तैयार है?
7) इस ड्राफ्ट में जीएसटी की तर्ज पर ही राज्यों के कृषि मंत्रियों की एक राष्ट्रीय कमेटी गठित करने का प्रस्ताव है। जीएसटी काउंसिल में गैर भाजपा राज्यों के साथ खुला भेदभाव हो रहा है और वे सार्वजनिक तौर पर लगातार विरोध कर रहे हैं।
उपरोक्त तमाम तथ्यों से यह स्पष्ट है कि विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मॉनेटरी फंड (आईएमएफ) की सिफारिश के अनुरूप ही उदारीकरण के नाम पर भारतीय कृषि और कृषि व्यापार को कॉरपोरेट पूंजी के लिए खोलने का एजेंडा है जो की तीन कृषि कानूनों में भी था। इससे न केवल किसान की बदहाली बढ़ेगी, बल्कि हमारी राष्ट्रीय संप्रभुता व खाद्य सुरक्षा भी नष्ट होंगी ।
अधिकतर कृषि विशेषज्ञ ,कृषि अर्थशास्त्रियों ने अखबारों में लेख लिखकर कृषि विपणन की योजना के राष्ट्रीय प्रारूप के मसौदे को सिरे से खारिज किया है उधर पंजाब व केरल सरकारों ने भी इसे अस्वीकार किया है । विकसित देशों में जहां भी कॉर्पोरेट ने कृषि क्षेत्र को अपने वर्चस्व में लिया है वहां के किसानों को बड़े स्तर पर आंदोलन करने पड़ रहे हैं।
हमारा प्रदेश कृषि प्रधान है। बहुमत जनता कृषि पर निर्भर है पहले ही यहां बेरोजगारी चरम सीमा पर है यहां वास्तव में तो मौजूदा मंडी व्यवस्था को सुदृढ़ करने की जरूरत है,कृषि में निवेश बढ़ाने के लिए बजट आवंटन बढ़ाया जाए, लागत मूल्य घटाने के लिए इनपुट सस्ते किए जाएं ,किसान व खेत मजदूरों को कर्ज से मुक्त किया जाए ,बिजली के निजीकरण को रोका जाए ,भूमि के अंधाधुंध अधिकरण पर रोक लगे, जल भराव ,लवण, रेही इत्यादि से खराब हुई भूमि को सुधारा जाए, कृषि आधारित स्थानीय उद्योग लगे आदि प्राथमिकता पर होने चाहिए ।
अतः हम आपसे पुरजोर आग्रह करते हैं कि हरियाणा के किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए कृषि विपणन ड्राफ्ट को लागू करने के लिए अपनी स्वीकृति प्रदान न करें।
