________ चुनाव आयोग और ईवीएम संबंधित महत्वपूर्ण याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट का सुनवाई से झन्कार..!!
_____अब सुप्रीम कोर्ट चंद्रचूड़ साहब से भी आगे बढ़ गया..!!
_________ प्रेस की स्वतंत्रता या पर्स की स्वतंत्रता : पी साईनाथ का व्याख्यान…!!
नई दिल्ली. ..!!!
- चुनाव आयोग और ईवीएम संबंधित महत्वपूर्ण याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट का सुनवाई से इन्कार और कई याचिकाओं की अगली तारीखों पर तारीखें देना, बीजेपी को जीताने के लिए चुनाव आयोग को ईवीएम में गड़बड़ियों के निशान मिटाने की और पकड़े जाने वाली गड़बड़ियों को अगले चुनाव में ठीक करने के लिए समय देने के अलावा कुछ भी नहीं।
इन दो महत्वपूर्ण याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई से मेरी बात को आसानी से समझा जा सकता है।
अप्रैल 2024 में वर्तमान मुख्य न्यायाधीश और दत्ता साहब की बैंच ने सरकार या चुनाव आयोग के माध्यम से जो लिखकर दिया गया था इस विश्वास के साथ उसे पढ़ दिया गया था कि इस तरह चुनाव आयोग अपने आपको बचा लेगा।
स्पष्ट है बर्न्ट मेमोरी की जांच वो भी केवल दूसरा और तीसरा उम्मीदवार और वो भी 45 हजार रुपए प्रति मशीन।
___ यह फैसला भी बुनियादी रूप से साधारण और गरीब नागरिक के चुनाव लड़ने और चुनाव के दौरान होने वाली किसी गड़बड़ी की आशंका के विरुद्ध आपत्ति के अधिकार को छीनना है।
__ देश का न्यायालय स्वयं कैसे संविधान प्रदत्त देश के नागरिक के बुनियादी अधिकार को छीन सकता है? इस तरह के फैसले से पहले तो बर्न्ट मेमोरी की जांच से चौथे उम्मीदवार से नोटा तक के वोट चीप में किसी प्रोग्रामिंग के द्वारा यदि ट्रांसफर किए जाते होंगे क्योंकि इसका प्रयोग निश्चित ही बीजेपी का वोट प्रतिशत बढ़ाने के लिए किया जाता होगा तो वह इस जांच में पकड़ में नहीं आ सकता। उसे केवल व केवल वीवीपेट पर्ची की गणना और मिलान से ही पकड़ना संभव है।
__बर्न्ट मेमोरी की जांच से यदि पकड़ में भी आता होगा मैं कोई विशेषज्ञ तो नहीं हूं लेकिन थोड़ी सतही जानकारी के बाद भी कह सकता हूं कि वोटों का घटाना – बढ़ाना और एक साथ बटन दबाकर कर कई डाले गए वोट इत्यादि की जानकारी हो सकती होगी ?
__ यह जांच भी फैसले में उन्हीं से करने का प्रावधान किया गया कि यदि गड़बड़ी की गई हो तो उन्हीं कंपनी के इंजिनियर्स के द्वारा स्वयं या उनके सहयोग से?
____ किसी स्वतंत्र विशेषज्ञों की जांच एजेंसी से नहीं।
__इस फैसले के बाद भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार चुनाव आयोग ने हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली के चुनावों तक न तो स्टैंडर्ड आपरेटिंग प्रोसिजर बनाया और न ही किसी उम्मीदवार के द्वारा पैसा जमा करने पर भी बर्न्ट मेमोरी की जांच के लिए कोई कार्रवाई को आगे बढ़ाया?
__उसके स्थान पर सुप्रीम कोर्ट के भी आदेश की अवमानना करते हुए मेमोरी की जांच तो दूर मशीनों से डाटा डिलीट कर दिया और मशीन में नया प्रोग्राम अपलोड कर माक पोल शुरू कर दिया!
__लगता है चुनाव आयोग उन कंपनी के इंजिनियर्स को जांच कर झूठी रिपोर्ट देने के लिए तैयार नहीं कर सका।
___इसलिए उसने मशीनों से डाटा डिलीट करने का रास्ता अपनाया।
___अवमानना के इतने खुले सबूतों के बाद भी सुप्रीम कोर्ट की कोई कार्रवाई नहीं और केवल डाटा डिलीट नहीं करने का नम्र निवेदन क्या बताता है?
__ दूसरा मनमाने ढंग से मोदी सरकार द्वारा नये चुनाव आयुक्त (“”राजीव कुमार -2″”) की नियुक्ति की मार्च 2024 की लगी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का देश की जनता के साथ खिलवाड़ करने वाला व्यवहार?
__हम फिरंगियों से आजादी के 77 साल बाद भी कहां पहुंच गए हैं और किनके हाथों में?
___आज सरकार तो केवल कार्पोरेट्स के लिए ही है उससे भी भयानक पक्ष न्यायपालिका और मीडिया का है जो भी आज केवल धन आश्रित केवल धनवानों के लिए ही रह गया है।
*यह बात एडीआर के वरिष्ठ व आदरणीय डाक्टर अग्रवाल साहब और भारत ही नहीं पत्रकारिता के क्षेत्र में दुनिया में जाना पहचाना चेहरा पी.साईंनाथ को इन। विषयों पर गौर से सुनिए।
एक जमीनी पत्रकार पी साईनाथ को सुनना खुद को समृद्ध करना है. बहुत सारी चीजों को तथ्यों के साथ जानना है जो दिखाई कुछ और देता है पर हक़ीक़त में कुछ और है. पी साईनाथ रायपुर आये हुए थे. उन्होंने “प्रेस की स्वतंत्रता या पर्स की स्वतंत्रता” विषय पर बेहद मानीखेज वक्तव्य दिया…!!
प्रेस की स्वतंत्रता भारत में एक मज़ाक बनकर रह गई है. इस मामले में दुनिया में भारत का क्या स्थान है यह जगजाहिर है. दरअसल जिसे मेन स्ट्रीम मीडिया बोला जाता है वह पूरी तरह से कॉर्पोरेट मीडिया है…!!
सरकारी मीडिया पर तो बात करने का कोई मतलब ही नहीं निकलता इस दौर में. इंडिपेंडेंट मीडिया ही है जिससे उम्मीद है. इंडिपेंडेंट मीडिया मतलब जो न कॉर्पोरेट द्वारा पोषित है और सरकार तो उसकी दुश्मन ही है. ऐसे मीडिया का सपोर्ट करना एक जागरूक समाज के लिए जरूरी है।
