______ लघु लेख- 74 …!!
_________बंगाल ने तो वो दिन भी देखा है …!!
1964 में कम्यूनिस्ट पार्टी का विभाजन और कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी का जन्म हुआ।1967 में चतुर्थ आम चुनाव ।मार्क्सवादी पार्टी के साथ वाले लेफ्ट फ्रंट,कम्यूनिस्ट पार्टी के साथ वाले लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस के बीच लड़ाई हुई।दोनों लेफ्ट फ्रंट ने मिलकर सरकार बनाई।कांग्रेस पहली बार विपक्ष हो गई।
कांग्रेस से निकले अजय मुखर्जी गैर वामपंथी मुख्यमंत्री और ज्योति वसु उप मुख्यमंत्री हुए।मार्च में सरकार बनी जून में नक्सलबाड़ी में सशस्त्र आंदोलन छिड़ गया। राजस्व मंत्री हरे कृष्ण कोन्नार उन्हें समझाने गए।वह नहीं माने।चीनी रेडियो ने आंदोलन को समर्थन और
ज्योति बसु को गाली दिया।
वाम मोर्चा सरकार के खाद्य मंत्री प्रफुल्ल घोष ने नौ महीने बाद त्यागपत्र दे दिया। सरकार बर्खास्त हो गई।प्रफुल्ल घोष मुख्य मंत्री बन गए। दूसरी सरकार बन गई।
वह भी मात्र तीन महीने चली।राष्ट्रपति शासन हो गया।
फ़रवरी 69 में चुनाव हुआ।लेफ्ट फ्रंट को 214,उसमे सी पी एम को 81 और कांग्रेस को 55 सीट मिली। दुबारा अजय मुखर्जी मुख्य मंत्री और ज्योति बसु उप मुख्य मंत्री हुए। 70 के मार्च में अजय मुखर्जी ने त्यागपत्र दे दिया।ज्योति बसु ने मुख्यमंत्री पद का दावा पेश किया।राज्यपाल ने उसे अस्वीकार कर दिया।31 मार्च को पटना में ज्योति बसु की हत्या का प्रयास हुआ।
71 के मार्च में चुनाव हुआ। सीपीएम वाला वाम मोर्चा 123 पर विजयी हुआ। स्वयं को कांग्रेस विरोधी बताने वाले सीपी आई वाले वाम मोर्चे ने साथ नहीं दिया।पांच सीटों पर विजय वाले अजय मुखर्जी कांग्रेस के बल पर मुख्य मंत्री हो गए।जून में अजय मुखर्जी की सिफारिश पर विधान सभा भंग हो गई।
राज्यपाल शासन लागू हुआ और अभूत पूर्व काम सिद्धार्थ शंकर राय को दफ्तर हीन मंत्री बना दिया गया।
जनवरी 72 में अजय मुखर्जी अपनी बांगला कांग्रेस को भंग कर पुराने घर कांग्रेस में चले गए। मार्च में चुनाव हुआ ।सिद्धार्थ शंकर राय के कांग्रेसी गुंडों ने अपना तांडव दिखाया। धांधली से ज्योति बसु को भी हारा हुआ दिखाया गया ।आठ दलों के वाम मोर्चे ने चुनाव का बहिष्कार कर असेंबली में अपने सदस्यों को नहीं भेजा।सिद्धार्थ शंकर राय मुख्य मंत्री हुए।वाम मोर्चे का बहिष्कार 5 साल चला।
लंबे समय से आर एस एस एस कांग्रेस की आड़ में छिपा रहा।
जून 77 के चुनाव में वाम मोर्चा दो तिहाई सीटें जीतने में सफल रहा।ज्योति बसु पहली बार मुख्य मंत्री हुए।और पहला निर्णय राजनीतिक बंदियों को छोड़ने का हुआ।बड़ी संख्या में नक्सली भी छूटे।
सीपीएम के हजारों सदस्य नक्सलीयों और 1100 सिद्धार्थ शंकर राय के गुंडों द्वारा मारे गए।फिर भी वह अडिग रहे । दश साल में ममता के गुंडों ने उसी को दोहराया है किन्तु उससे भी कम्युनिस्टों का हौसला नहीं टूटेगा।
एक कवि ने ऐसे ही लोगों के लिए कहा है_
….पराजित हैं हम….पर सदा के लिए नहीं…कल हम फिर उठेंगे
अधिक विवेक …और अनुशासन के साथ।
वाम पंथ ही क्यों?
डॉ महेन्द्र प्रताप सिंह ***
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