निशा
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हम इंसानों के शरीर में दो प्रकार के DNA होते हैं – पहला न्यूक्लियर DNA और दूसरा माइटोकॉन्ड्रियल DNA।
हम सभी जानते हैं कि हमारी शारीरिक संरचना और गुणसूत्र (chromosomes) हमारे माता-पिता से मिलकर बनते हैं. न्यूक्लियर DNA हमारे गुणसूत्रों में होता है और यह दोनों माता-पिता से आता है.
लेकिन माइटोकॉन्ड्रियल DNA ऐसा है जो केवल हमारी माँ से आता है।
माइटोकॉन्ड्रियल DNA खास है क्योंकि यह केवल महिलाओं से ही संतान तक पहुंचता है। इसका मतलब है कि हम सभी में माइटोकॉन्ड्रियल DNA हमारी ब्लड लाइन में जितनी भी महिलायें हुई हैं उनसे गुज़रता हुआ आया है.
मतलब आपके शरीर में आपकी माँ का ,और उनके शरीर में आपकी नानी का और आपकी नानी में उनकी माँ का डीएनए हजारों लाखों सालों से लगातार प्रवाहित हो रहा है।
औरत ना सिर्फ हमें जीवन देती है, बल्कि वह हमारे शरीर में अपनी पूर्वजों के इतिहास और अनुवांशिकता को भी संजोकर रखती है। इस DNA को देखकर हम यह कह सकते हैं कि हर महिला अपने अनुवांशिक रचनात्मकता के माध्यम से एक अद्वितीय शक्ति का प्रतीक है। और ये शक्ति प्रकृति ने सिर्फ और सिर्फ औरत को ही दी है। इस प्रकार से प्रकृति ने महिला को ही वह शक्ति दी है जो पूरी मानवता के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
इसलिए दुनिया की हर महिला आपके और हमारी अनुवांशिक पहचान और इसके इतिहास को भी जीवित रखती हैं। महिलाओं का यह योगदान हमें याद दिलाता है कि महिला का स्थान हमारे जीवन में केवल एक माँ, बहन, बेटी या पत्नी के रूप में नहीं है, बल्कि वह हमारी इतिहास की संरक्षक और मानवता की सबसे सशक्त कड़ी हैं।
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भविष्य में कभी यदि हमारी इंसानी सभ्यता मेडिकल इंजीनियरिंग में कुछ ऐसा स्तर हासिल कर पाए जिसमे वो इंसानी शरीर के सबसे छोटे कतरे को इस्तेमाल करके प्रयोगशालाओं में हमारे पूर्वजों को फिर से जन्मा सकें , तो उन्हें इसी माइटोकॉन्ड्रियल DNA का ही इस्तेमाल करना पड़ेगा।
और मुझे पूरा यकीन है कि हम इंसानी सभ्यता पूरी तरह विलुप्त हो जाने से पहले कम से कम विज्ञान का ये पड़ाव तो हासिल कर ही लेगी।
सोचिये …. और उस वक़्त की कल्पना कीजिये कैसे आपकी आने वाली नस्लें आज से हजारों साल पुरानी अपनी किसी नानी को साक्षात देख सकेंगे। या हो सकता है आपको और आपकी वाइफ या माँ को भी देख सकें ?
तब शायद ये इंसानी सभ्यता अपने विकास के सबसे शुरूआती अवस्था के उस वैज्ञानिक दार्शनिक पहलू की महत्ता समझ सके जिसमे सारे कबीले और सारे परिवार की पहचान का केंद्र बिन्दु एक महिला होती थी।
मुझे पूरा यकीन है भविष्य में इंसान इस धर्म जाती क्षेत्र और हर प्रकार की नफरत की निकृष्ट सोच से ऊपर उठ जाएगा , और ये समझ पायेगा और स्वीकार कर सकेगा की इंसानी सभ्यता के सौ फीसद हिस्से का एक बहुत बड़ा हिस्सा हमने औरतों की सरपरस्ती में बिताया था।
तब शायद हम ये समझ पाएंगे की औरत का योगदान सिर्फ इंसान को जन्मने और पालने से कहीं ज्यादा है , औरत ने मानव सभ्यता के विकास की शैशव अवस्था में पूरी इंसानी जात को ऊँगली पकड़कर आगे बढ़ाया है।
आप इसे दार्शनिक रूप से समझें या वैज्ञानिक रूप से , लेकिन ये अटल सत्य है की औरत ने सिर्फ इंसान को ही नहीं जन्मा , बल्कि उसने पूरी इंसानी सभ्यता के विकास को जन्मा और पाला पोसा है।
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थैंक्स & Happy “International Women’s day” to all.
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संग्लन चित्र –
राहुल सांकृत्यायन की “वोल्गा से गंगा” की पहली कहानी की नायिका “निशा” का काल्पनिक चित्र।
आज से 8000 साल पहले , जिसमे “निशा” शिकार से वापिस आकर अपनी गुफा में बच्चों को दूध पिलाती हुई अपनी बूढ़ी माँ को शिकार का मांस सभी में बांटने को देती है।
