_______आदिवासियों की हत्याएं करने के बाद अर्धसैनिक बलों के जवान नाचते हैं : सोनी सारी
बस्तर / छत्तीसगढ़
आजकल बस्तर में जनसंहार चल रहा है। वहां नक्सलियों के नाम पर अर्ध सैनिक बलों द्वारा बड़े पैमाने पर आदिवासियों की हत्याएं की जा रही हैं। और इसके पीछे मुख्य मकसद है आदिवासियों की जमीन पर कैसे कॉरपोरेट को कब्जा दिलाया जाए।
सोनी सोरी का कहना है कि हर दिन पांच से दस आदिवासियों को गिरफ्तार किया जाता है; फर्जी मुठभेड़ की जाती हैं। इसका मुख्य उद्देश्य आदिवासियों का अस्तित्व खत्म करना है। जो भी बस्तर में संघर्ष करता है, चाहे वह एमबीएम हो, सोनी सोरी हो या हिड़मे मरकाम—उन्हें नक्सली करार देकर कुचल दिया जाता है। यही सुनीता के साथ भी किया गया।
सुनीता का पैतृक स्थान, बीजापुर जिले का गंगालूर (वह पोसनार से हैं), खनन के लिए चिह्नित पहाड़ियों से भरा हुआ है। यदि केंद्र और राज्य सरकारों को खनन करना है, तो वे अपने लक्ष्यों को पाने के लिए किसे निशाना बनाएंगी? वहां रहने वाले—आदिवासियों को। अगर जमीन खाली करानी है, तो आदिवासियों को खत्म करना होगा। और अगर आदिवासियों को मिटाना है, तो उनके नेताओं को प्रतिबंधों और गिरफ्तारियों के जरिए निशाना बनाना होगा।
यह सब सरकार की एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य आदिवासियों को जंगलों से हटाकर खनिज संपदा से भरपूर पहाड़ियों को बड़े पूंजीपतियों को सौंपना है। “नक्सली” का ठप्पा तो बस एक बहाना है। असली लड़ाई जंगलों में रहने वालों के खिलाफ है।
गृह मंत्री जो कह रहे हैं, वह नया नहीं है। यही बातें पहले भी कही जा चुकी हैं। फर्क बस इतना है कि इस बार वे इसे और आक्रामक तरीके से कह रहे हैं!
इससे पहले सलवा जुडूम चला था। इस अभियान का सबसे बुरा असर किन पर पड़ा? आदिवासियों पर। फिर बस्तर बटालियन बनी, दंतेश्वरी फाइटर्स आए, कमांडो बटालियन फॉर रिजॉल्यूट एक्शन (CoBRA) बटालियन तैनात की गई, और कई अन्य बल लाए गए। पुलिस कैंप स्थापित किए गए, हर तरह की सैन्य ताकत झोंकी गई—आदिवासियों को खत्म करने के लिए।
सोनी सोरी का कहना है कि जहां फर्जी मुठभेड़ होती हैं, वहां हमें जाने नहीं दिया जाता, सवाल पूछने नहीं दिया जाता। जब हम मीडिया से बात करने या अपनी आवाज उठाने की कोशिश करते हैं, तो हमें चुप करा दिया जाता है। राज्य पूरी दुनिया से बात करता है, लेकिन बस्तर के लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की आवाज कुचल दी जाती है।
अब अमित शाह कह रहे हैं कि 2026 तक माओवादी खत्म हो जाएंगे। असली रणनीति क्या है? जब कोई व्यक्ति माओवादी बताकर मारा जाता है, तो दावा किया जाता है कि उसके सिर पर 2 लाख, 3 लाख, 4 लाख का इनाम था। असल में, जो लोग मारे जा रहे हैं, वे आदिवासी किसान होते हैं, लेकिन उन्हें माओवादी करार दे दिया जाता है।
हमने तो 60 लाख और 1.5 करोड़ तक के इनाम वाली “माओवादियों” की कहानियां सुनी हैं। आप एक आदमी को मारते हैं, और इनाम की राशि बांट दी जाती है। यही असली रणनीति है—आदिवासियों के खिलाफ एक संगठित अभियान।
लेकिन कानूनी रूप से क्या होना चाहिए? सबसे पहले, पोस्टमॉर्टम होना चाहिए। जिस गाँव का माओवादी मारा गया है, उसकी ग्राम पंचायत को सूचित किया जाना चाहिए; परिवार को जानकारी दी जानी चाहिए; गाँव के लोगों, विशेष रूप से शिक्षित लोगों को बताया जाना चाहिए।
लेकिन वे ऐसा कुछ भी नहीं करते। पोस्टमॉर्टम नहीं किया जाता। अख़बारों में कोई जानकारी प्रकाशित नहीं होती। मरने के बाद इनाम की घोषणा की जाती है। यही कारण है कि यहाँ हर दिन खून बह रहा है। किसी को मारो और पैसा लो। आत्मसमर्पण करो और पैसा लो। मेरा सवाल केंद्र और राज्य सरकारों से है:
यह पैसा आता कहाँ से है? क्या आपके पास इसका कोई हिसाब है? इतनी सैन्यीकरण के बावजूद गोलियाँ चलना बंद नहीं हुईं। अगर अमित शाह और केंद्र सरकार को वास्तव में माओवादियों से लड़ना है, तो वे निर्दोष आदिवासियों को मारे बिना यह करें। जंगलों और पहाड़ों को नष्ट किए बिना करें। पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना करें।
वे दावा कर रहे हैं कि वे माओवादियों का सफाया कर रहे हैं, लेकिन असल में यह आदिवासियों का सफाया है, माओवादियों का नहीं। इनामी राशि क्या जनता का पैसा नहीं है? इसका हिसाब कहाँ है। इसे कौन आवंटित करता है? कौन इसका ऑडिट करता है? यह सब कहाँ दर्ज किया जाता है? मैं इस जानकारी को उजागर करने के लिए तैयार हूँ। लेकिन अगर मैं इस पर सवाल उठाने के लिए आवेदन दायर करूँ, तो मुझे नक्सली करार देकर मार दिया जाएगा या जेल में डाल दिया जाएगा।
लेकिन हमें मारे जाने या जेल जाने का डर नहीं है, क्योंकि हमारी लड़ाई हमारे जंगलों और मानवता के लिए है।
सोनी सोरी: गाँववालों की ज़िंदगी पर क्या असर पड़ता है? गाँव के लोग सो नहीं पाते। जब ये कैंप स्थापित कर लेते हैं, तो सेना के जवान गाँवों पर बमबारी करते हैं। आदिवासी किसान अपने खेतों में नहीं जा सकते, पानी नहीं भर सकते, लकड़ी नहीं काट सकते, तेंदू पत्ता नहीं इकट्ठा कर सकते। यही हाल आज बीजापुर में देखने को मिल रहा है।
मैं एक रात सिलगेर से आगे एक गाँव में ठहरी थी। रात 1 बजे बम गिरने की आवाज़ से मेरी नींद खुली। मेरे साथ एक गर्भवती महिला थी। उसने कहा कि यह रोज़ होता है और उसके गर्भ में पल रहे बच्चे तक को इस शोर से तकलीफ़ होती है। उसने मुझसे कहा, “मेरे पेट पर हाथ रखकर देखो, बच्चा बेचैन है।”
सोनी सोरी कहती हैं कि मेरे पास तस्वीरें और वीडियो हैं, जो दिखाते हैं कि बमबारी का पर्यावरण और ज़मीन पर क्या असर पड़ता है। आप सिर्फ़ इंसानों को नहीं मार रहे, बल्कि पूरी प्रकृति को नष्ट कर रहे हैं। यह केवल हमारा मुद्दा नहीं है, यह पूरे देश का मामला है।
सरकार संवाद क्यों नहीं करना चाहती? अर्धसैनिक बल हर जगह क्यों हैं? क्या उनकी इतनी बड़ी संख्या में तैनाती की कोई ज़रूरत भी है? सरकार माओवादियों से बात करने से पहले बस्तर के लोगों से बात क्यों नहीं करती? लेकिन सरकार खुले तौर पर संवाद नहीं करना चाहती। पैसे की राजनीति और जश्न मनाने की क्रूरता जिस दिन राज्य पैसे बाँटना बंद कर देगा, उसी दिन आदिवासियों पर अत्याचार भी बंद हो जाएँगे।
सोनी सोरी: बच्चे गोलियों का सामना कर रहे हैं। इंद्रावती नदी के इलाके में चार बच्चों को गोलियाँ लगीं। हमारे पास उनके रिकॉर्ड हैं। एक बच्चा, जो अभी सिर्फ़ एक साल का था, अपनी माँ का दूध पी रहा था। जब अर्धसैनिक बल गाँव में पहुँचे, तो बच्चे का पिता उसे लेकर जंगल की तरफ़ भाग गया। उसे लगा कि अगर बच्चा रोया तो वे उसे पकड़ लेंगे। वह जंगल में छिप गया, लेकिन उन्होंने उसे पकड़कर मार डाला।
बस्तर की महिलाएँ हमें बताती हैं- “सोनी दीदी, हमें मरने से डर नहीं लगता। हम पर गोलियाँ चला दो, लेकिन हमसे बलात्कार मत करो!” “हम मरने को तैयार हैं, लेकिन इस यातना को सहने को नहीं!” यहाँ बलात्कार सबसे बड़ा आतंक बन चुका है।
बलात्कार, हत्या और वहशी अत्याचार महिलाओं को ज़िंदा यातनाएँ दी जाती हैं। उन्हें नोचा जाता है, पीटा जाता है, बलात्कार किया जाता है और फिर गोलियों से मार दिया जाता है। मैंने कितनी ही महिलाओं के घायल और सूजे हुए प्राइवेट पार्ट देखे हैं! कितनी ही फटी हुई जाँघें और ज़ख़्म देखे हैं!
सोनी का कहना है कि मैं खुद पूरे बस्तर के आदिवासियों को इकट्ठा करने के लिए तैयार हूँ। मैं खुद माओवादियों से भी बात करने के लिए तैयार हूँ। लेकिन पहले सरकार को हमसे बात करनी होगी। और मुझे यह भरोसा दिलाना होगा कि आदिवासी जमीन का एक टुकड़ा उनसे नहीं छीना जाएगा।
सोनी सोरी: हम कंपनियों का विरोध करते हैं। उदाहरण के लिए, NMDC (नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन) पिछले 75 सालों से यहाँ खनन कर रही है। हमने सोचा था कि— इससे आने वाली पीढ़ियों के लिए रोजगार मिलेगा। अस्पताल और स्कूल बनेंगे। हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा।
लेकिन आज सच्चाई यह है: पहाड़ खोखले हो गए हैं। लोग ज़हरीला लाल पानी पीने के लिए मजबूर हैं। बच्चे बच नहीं पाते।
