22 अप्रैल (1870) — जन्मदिन के अवसर पर कोमरेड लेनिन को लाल सलाम…..!!!
_____ लेनिन: मज़दूर की आँखों से….!!
हम नहीं पढ़े थे इतिहास की मोटी किताबें,
ना जानते थे पूंजी का हर फरेब।
हम तो बस जानते थे—
रोटी कैसे छिनती है,
और कैसे पसीना लहू बनकर
ज़मीन में बहता है।
फूटा एक नाम—लेनिन!
ना मंदिरों की घंटियों से,
ना तख़्तों की चाप से,
उभरा वो भट्ठियों की आग से,
कामगारों की साँसों की राख से।
उसने न मन्त्र पढ़े, न तख़्त की आरती उतारी,
बस ललकारा—
“अब राज करेंगे मज़दूर,
अब जनता नहीं झुकेगी,
अब ज़ार नहीं बचेगा!
अब पूंजीवाद नही बचे गा”
उसकी बात नहीं थी झूठे वादों की,
बल्कि हथौड़े की चोट थी
जो सीधे दिल में उतर गई—
और तब से
हमने जाना:
हमारे जैसे भी राज कर सकते हैं।
उसने नहीं माँगा हमारा वोट,
उसने सपना नहीं,
इंक़लाब का नक़्शा दिया—
कि कारख़ाने हमारे होंगे,
ज़मीन हमारी होगी,
और कोई ‘ज़ार’ नहीं
कोई पूंजीपति नही
कोई जुल्मी मालिक नही
हमारे सिर पर सवार होगा।
उसकी कलम हथौड़ा थी,
और शब्द—हथियार।
हर पंक्ति में हमने देखा
अपना चेहरा,
अपना भविष्य।
*अक्टूबर की वो लाल रात*
हमारे लिए पहली सुबह थी—
जब हथौड़े की चोट से
ताज उखाड़ा गया था।
जब पहली बार
मज़दूर ने इतिहास की ज़ुबान में
अपना नाम लिखा था।
उसने कहा—
“हर थके हुए हाथ को आराम चाहिए,
*हर भूखे पेट को खाना।*
क्रांति वही है
जो रोटी से शुरू होकर
इंसानियत तक पहुँचे।”
हमें सिखाया—
*धनी की दौलत, हमारा लूटा हुआ हक़ है।*
ज्ञान, बंद दरवाज़ों में नहीं,
खुले संघर्ष के मैदानों में उगता है।
आज जब ठेके पर काम करते हैं,
बिना यूनियन, बिना हक़,
तो याद आता है—
वो जो बोलता था हमारे नाम से।
जो कहता था—
*”तुम्हारी चुप्पी, उनकी ताक़त है।”*
लेनिन मर गए,
ये झूठ है—
हमारे हर संघर्ष में
वो ज़िंदा है।
हर हड़ताल, हर नारे में
उनकी साँसें चलती हैं।
क्योंकि जब तक मज़दूर साँस लेता है,
जब तक ज़ुल्म की दीवारें खड़ी हैं—
लेनिन कोई लौ नहीं,
वो अंगार है—
जो हर मज़दूर की रगों में
इंक़लाब बनकर धड़कता है।
आज भी हर फैक्ट्री, हर खेत, हर मोर्चे पर
जहाँ पूँजी से टकराती है मेहनत की ताक़त—
कामरेड लेनिन हमारे साथ ही नहीं,
हमारे भीतर खड़े हैं…!! …..एम के आज़ाद…!!
