________”मैं वो लिखता हूँ जो आप छुपाते हैं,….!!
_आप गंद हटा दें…”..
….(मंटो की अदालत में)
जज बोले —
“तुम लिखते हो गंद!”
मंटो मुस्कराया,
जैसे कोई फटीचाक शेर कहता है चुपचाप।
“हुज़ूर,”
उसने कहा,
“मैं वो लिखता हूँ जो आप छुपाते हैं,
जो अखबारों की हेडलाइन नहीं बनता,
जो अदालत की भाषा में ‘अश्लील’ है —
पर सड़क की हकीकत है।
मैंने कोठों की बत्तियाँ नहीं जलाईं,
मैंने बस बताया कि वो जल रही हैं —
और उस रोशनी में किसकी ज़िंदगी राख होती है।
मैंने ‘ठंडा गोश्त’ नहीं पकाया,
बस उसकी बदबू को
इस सड़े हुए समाज के सामने रख दिया।
गवाही नहीं माँगी थी,
पर मैंने बयान दिया —
ज़ख्मों की जबान में।
आप गंद हटा दें —
मैं उसे लिखना छोड़ दूँगा।
जब मज़दूर का जिस्म बिकना बंद हो जाएगा,
जब लड़कियाँ स्कूल और बारात में बराबरी से चलेंगी,
जब धर्म के नाम पर बलात्कार बंद हो जाएगा,
तब मेरी कलम भी इश्क़ लिखेगी —
और बसंत!”
“पर जब तक ये गंद सड़कों पर नाचेगी,
मैं उसे सफ़ेद काग़ज़ पर उतारता रहूँगा,
क्योंकि स्याही को भी सच्चाई का हक़ है —
और इंसानियत को भी आइना चाहिए।
कलम मेरी वो तेज़ रेखा है —
जो लाश के बदन से भी स्याही खींच लाती है।
आप खामोश रहें —
पर मैं नहीं रहूँगा।
क्योंकि जब समाज बोलने से डरे,
तब लेखक चीख़ते हैं।”
जज खामोश था।
और मंटो…
वो एक और कहानी लिखने जा रहा था —
जिसमें अदालत भी थी, और समाज भी,
पर सबसे ऊपर था —
एक कलम,
जो झूठ से इनकार करती थी…….!!…एम के आज़ाद
