________ बिहार में मतदाता सूची विवाद _ नौ भ्रांतियां और एक सच __योगेंद्र यादव।
______ इस ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ से अंतिम व्यक्ति के हाथ से वह एकमात्र अधिकार चला जाएगा जो आज भी उसके पास है – वोट का अधिकार….!!!
_______ बिहार में मौजूदा मतदाता सूची का संशोधन पुरानी मतदाता सूची को पूरी तरह से रद्द कर नए सिरे बनाई जाएगी मतदाता सूची..!!
_____ पहले नोटबंदी हुई, फिर कोरोना में देशबंदी हुई, अब वोटबंदी की तैयारी …!!!
नई दिल्ली. .!!
बिहार में आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। चुनाव आयोग के “विशेष गहन पुनरीक्षण” अभियान पर कई सवाल उठाए जा रहे हैं, और कई भ्रांतियां भी फैलाई जा रही हैं। जाने-माने विश्लेषक योगेंद्र यादव ने इन भ्रांतियों को दूर करते हुए एक चौंकाने वाला सच उजागर किया है।
भ्रांति ___ 1: चुनाव आयोग बिहार की वोटर लिस्ट की गहरी छानबीन और संशोधन कर रहा है।
सच___: यह सच नहीं है। बिहार में मौजूदा मतदाता सूची का संशोधन नहीं होगा। इसके बजाय, पुरानी मतदाता सूची को पूरी तरह से रद्द कर नए सिरे से मतदाता सूची बनाई जाएगी।
भ्रांति ___2: ऐसा पुनरीक्षण पहले दस बार हो चुका है, इसमें कोई नई बात नहीं है।
सच__: यह दावा भी गलत है। इस बार जो हो रहा है वह अभूतपूर्व है। मतदाता सूची के कंप्यूटरीकरण के बाद नए सिरे से सूची बनाने की आवश्यकता नहीं होती। यह 22 साल में पहली बार है कि ऐसा हो रहा है। पहले कभी मतदाता पर अपना नाम मतदाता सूची में डलवाने की जिम्मेदारी नहीं डाली गई थी, न ही उनसे नागरिकता साबित करने के कागजात मांगे गए। इससे पहले कभी चुनाव से चार महीने पहले नए सिरे से सूची नहीं बनाई गई।
भ्रांति ____3: बिहार की मतदाता सूची में ज़्यादा गड़बड़ी थी, इसलिए ऐसा करना पड़ा।
सच___: यह भी सच नहीं है। छह महीने पहले ही बिहार की पूरी मतदाता सूची का पुनरीक्षण हुआ था, जिसमें लाखों नाम जोड़े और हटाए गए थे। संशोधित सूची जनवरी में छपी थी और उसमें किसी बड़ी गड़बड़ी की शिकायत नहीं की गई थी। यदि कोई कमी रह गई थी, तो उसके लिए लगातार संशोधन चल रहा था। उस सूची को रद्द कर नए सिरे से बनाने की न तो कोई मांग थी और न ही कोई आवश्यकता।
भ्रांति ___4: जिनके नाम 2003 की मतदाता सूची में थे उन्हें कुछ करने की जरूरत नहीं होगी।
सच___: यह गलत है। हर व्यक्ति को नया फॉर्म भरना पड़ेगा। केवल उन्हीं को थोड़ी छूट मिलेगी जिनका नाम जनवरी 2025 की सूची में वही है (पूरा नाम, पिता का नाम, पता) जैसा 2003 की सूची में था। उन्हें अपनी जन्मतिथि और जन्मस्थान का प्रमाण नहीं देना होगा। लेकिन, उन्हें भी फोटो और हस्ताक्षर के साथ फॉर्म भरना होगा और 2003 की सूची में अपने नाम वाले पेज की फोटोकॉपी लगानी होगी।
भ्रांति ___ 5: प्रमाणपत्र सिर्फ़ उन्हीं से मांगा जाएगा जिनकी नागरिकता पर शक है।
सच___: यह भी सही नहीं है। जिनका भी नाम 2003 की सूची में नहीं था, उन सभी को फॉर्म भरने के साथ प्रमाण पत्र भी लगाने होंगे।
जिनका जन्म 1 जुलाई 1987 के पहले हुआ था, उन्हें सिर्फ अपनी जन्मतिथि और जन्मस्थान का प्रमाण देना होगा।
जिनका जन्म 1 जुलाई 1987 से 2 दिसंबर 2004 के बीच हुआ था, उन्हें अपने और अपने मां-पिता में से किसी एक का प्रमाण पत्र देना होगा।
जिनका जन्म 2 दिसंबर 2004 के बाद हुआ है, उन्हें अपने और अपने मां और पिता दोनों का प्रमाण पत्र देना होगा।
यदि मां और पिता का नाम 2003 की सूची में था, तो उस पेज की फोटोकॉपी से उनके प्रमाण पत्र का काम चल जाएगा, लेकिन आवेदक को अपनी जन्मतिथि और जन्मस्थान का प्रमाण तो लगाना ही पड़ेगा।
भ्रांति ____ 6: नागरिकता के प्रमाणपत्र के लिए चुनाव आयोग ने बहुत विकल्प दिए हैं, कोई न कोई काग़ज़ तो हर घर में मिल ही जाएगा।
सच___: यह भी गलत है। आम तौर पर जो पहचान या प्रमाण पत्र हर घर में होते हैं, उनमें से कोई भी चुनाव आयोग नहीं मानेगा – न आधार कार्ड, न राशन कार्ड, न चुनाव आयोग का अपना पहचान पत्र, न मनरेगा का जॉब कार्ड। चुनाव आयोग ने जो 11 प्रमाण पत्र मान्य किए हैं, उनमें से कुछ तो बिहार पर लागू ही नहीं होते या कहीं देखने को नहीं मिलते। कुछ गिने-चुने लोगों के पास ही होते हैं, जैसे पासपोर्ट (2.4 प्रतिशत), जन्म प्रमाण पत्र (2.8 प्रतिशत), सरकारी नौकरी या पेंशनधारी का पहचान पत्र (5 प्रतिशत) या जाति प्रमाण पत्र (16 प्रतिशत), जो साधारण घरों में नहीं मिलते। बचा मैट्रिक या डिग्री का प्रमाण पत्र, जो बिहार में आधे से कम लोगों के पास है।
भ्रांति ___7: जो नियम हैं सबके लिए बराबर हैं, इसमें कोई भेदभाव नहीं है।
सच__: कहने के लिए नियम बराबर हैं, लेकिन वास्तव में यह उन लोगों के साथ भेदभाव है जिन्हें जीवन में पढ़ाई के अवसर नहीं मिले। इसका असर यह होगा कि औरतें, गरीब, प्रवासी मजदूर और दलित-आदिवासी पिछड़े वर्ग के लोग प्रमाण पत्र देने में पिछड़ जाएंगे और उनका वोट कट जाएगा। शिक्षित होना नागरिकता की शर्त बन जाएगा।
भ्रांति __ 8: चुनाव आयोग ने तीन महीने का समय दिया है, सबका नाम शामिल हो जाएगा।
सच __: यह भी सच नहीं है। असली समय सिर्फ एक महीने का है, 25 जुलाई तक। बाकी दो महीने तो आपत्ति निवारण और आयोग की अपनी कागजी कार्यवाही के लिए हैं। इस पहले महीने में चुनाव आयोग की अपेक्षा है कि सभी बूथ लेवल ऑफिसर की ट्रेनिंग हो जाएगी (जबकि उनमें से 20 हजार की अभी नियुक्ति भी नहीं हुई थी), वे पार्टियों के एजेंट की ट्रेनिंग कर देंगे, हर घर में नए फॉर्म पहुंचा देंगे, हर व्यक्ति वह फॉर्म भर देगा, जो प्रमाण पत्र चाहिए उन्हें लगा देगा, भरे हुए फॉर्म को हर घर से इकट्ठा कर लिया जाएगा और उन्हें कंप्यूटर पर अपलोड कर उसकी जांच भी शुरू हो जाएगी! जिस भी व्यक्ति का फॉर्म 25 जुलाई तक जमा नहीं हुआ, उसका नाम मतदाता सूची में आएगा ही नहीं।
भ्रांति ___ 9: इस पुनरीक्षण से बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या खत्म हो जाएगी।
सच__: यह भी गलत है। यदि बिहार में अवैध विदेशी नागरिकों की समस्या है तो मुख्य रूप से बांग्लादेश से आए मुसलमानों की नहीं, बल्कि तराई के नेपालियों की है, जो अधिकांश हिंदू हैं। हो सकता है इससे कुछ हजार बांग्लादेशी नागरिकों और दसियों हजार नेपाली नागरिकों का नाम मतदाता सूची से कट जाए, लेकिन इसके चलते लगभग ढाई करोड़ भारतीय नागरिकों का नाम भी कट जाने की आशंका है। मक्खी मारने के लिए नाक पर हथौड़ा नहीं चलाया जाता।
_________अंतिम सच: वोटबंदी की तैयारी?
बिहार की कुल आबादी लगभग 13 करोड़ है। इनमें से लगभग 8 करोड़ वयस्क हैं जिनका नाम मतदाता सूची में होना चाहिए। इनमें से सिर्फ 3 करोड़ के करीब लोगों का नाम 2003 की मतदाता सूची में था। बाकी 5 करोड़ को अपनी नागरिकता के प्रमाण जुटाने पड़ेंगे। उनमें से आधे यानी ढाई करोड़ लोगों के पास वे प्रमाण पत्र नहीं होंगे जो चुनाव आयोग मांग रहा है।
योगेंद्र यादव का कहना है कि इस ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ से अंतिम व्यक्ति के हाथ से वह एकमात्र अधिकार चला जाएगा जो आज भी उसके पास है – वोट का अधिकार। पहले नोटबंदी हुई, फिर कोरोना में देशबंदी हुई, अब वोटबंदी की तैयारी है।
यह स्थिति बिहार के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए गंभीर चिंताएं पैदा करती है। क्या यह प्रक्रिया वास्तव में मतदाता सूची को शुद्ध करने के लिए है, या इसका उद्देश्य कुछ वर्गों को मताधिकार से वंचित करना है?
