_____और मैं गाजा की सड़कों पर चल रहा हूं ,.जश्न मनाने नहीं,
खाने के लिए नहीं..सिर्फ़ चावल के कुछ दानों की खोज में।
सड़ा हुआ चावल ….!!!
__गाजा के हालात दुखद….!!
मैं तुमसे कसम खाता हूँ। खुदा के सामने ।
इस बदनसीब सदी के सामने।
मेरे अंदर बची हुई इंसानियत की आखिरी चिंगारी के सामने।
कि जो मैंने आज देखा, वो जिंदगी नहीं थी।
ये हर उस चीज का ढहना था, जिसे पवित्र कहा गया।
पहले, गाजा में जुम्मा पवित्र हुआ करता था।
रिवाज की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए कि उसमें एक नज़ाकत होती थी।
अब्बू मछली लेकर आते
या शायद मुर्गे का एक टुकड़ा,
और एक घंटे के लिए,
हम इंसानों की तरह खाते।
हम गरीब थे, मगर इज़्ज़त से गरीब नहीं।
मेज पर हम मुस्कुराते,
एक छोटी-सी गोश्त की थाली के लिए खुदा का शुक्र अदा करते, और जिंदा महसूस करते।
हमें सांस लेने का हक़ महसूस होता।
यहाँ तक कि हम में सबसे गरीब भी इस इज्जत को जानता था।
वे पूरे हफ्ते बचत करते। भूख को आदत की वजह से नहीं, बल्कि उम्मीद के लिए सहते।
उस एक दिन के लिए।
उस एक खाने के लिए।
एक आम जिंदगी के वहम के लिए।
मगर अब?
आज जुम्मा है।
और मैं गाजा की सड़कों पर चल रहा हूं ,
जश्न मनाने नहीं,
खाने के लिए नहीं
सिर्फ़ चावल के कुछ दानों की खोज में।
सड़ा हुआ चावल।
धूसर दाने जो उंगलियों से चिपकते हैं और जिनमें कोई स्वाद नहीं।
कुछ भी, बस कुछ भी, जो पेट को चुप करा दे।
मेरे भाई ने एक बाजार छाना। मैंने दूसरा।
हम टुकड़ों के साथ लौटे।
हमने अपनी आखिरी सिक्कों से भुगतान किया।
वे राख के बदले सोना मांगते हैं।
और हम दे देते हैं, क्योंकि बच्चों को खाना चाहिए, और क्योंकि अब हम हिम्मत नहीं करते कि क्या जायज़ है क्या नाजायज़ कह सकें।
मगर मैं चावल की बात करने नहीं आया।
मैं वो कबूल करने आया जो मैंने देखा।
एक ट्रक गुजरा।
वो खाली था।
उसका फर्श आटे की पतली धूल से ढका था।
बस धूल।
न बोरे। न रोटी। बस उस चीज का निशान जो शायद कभी किसी बच्चे को बचा सकता था।
और फिर मैंने उन्हें देखा।
न विद्रोही। न अपराधी।
बच्चे।
वे दौड़े, जैसे शिकार किए जा रहे हों, उस ट्रक की ओर।
वे उन हाथों से चढ़े जिन्होंने कभी खिलौने नहीं पकड़े।
वे घुटनों के बल गिरे, जैसे किसी मज़ार के सामने।
और उन्होंने खुरचना शुरू किया।
एक के पास टूटी हुई ढक्कन थी।
दूसरे के पास गत्ते का टुकड़ा।
मगर बाकी, बाकी ने अपने हाथों का इस्तेमाल किया।
अपनी जीभ।
वे चाटने लगे।
सुन रहे हो?
वे जंग लगे लोहे से आटे की धूल चाट रहे थे। गंदगी से। उस ट्रक के पीछे से जो पहले ही चला गया था।
एक लड़का हंस रहा था।
खुशी से नहीं, बल्कि इसलिए कि भूख में इंसान पागल हो जाता है।
दूसरा चुपके से रो रहा था, जैसे कोई अब सुनता ही नहीं।
और मैं वहाँ खड़ा था।
अपनी सारी शर्म के साथ।
हाथ जेब में डाले, जैसे कोई बस का इंतज़ार कर रहा हो।
जैसे मैं दुनिया का अंत नहीं देख रहा था।
मैं चीखना चाहता था।
मगर कौन-सी चीख आसमान तक पहुंचेगी, जब आसमान ख़ुद बहरा हो चुका है?
कौन से शब्द बयान कर सकते हैं उस बच्चे की जीभ की आवाज़ को, जो आटे की धूल के लिए जंग से रगड़ रही थी?
अब कोई रूपक बाकी नहीं।
इसमें कोई खूबसूरती नहीं।
बस गुनाह।
बस जुर्म।
और हम सब गुनहगार हैं।
तुम। मैं।
वो जो ट्रक भेजते हैं।
वो जो जहाज़ भेजते हैं।
और खुदा?
अगर तू देख रहा है, तो हमारे साथ रो।
और अगर तू खामोश है, तो हम इस जहन्नम में अकेले हैं।
ये इक्कीसवीं सदी है।
मगर तारीख़ आगे नहीं बढ़ी।
इसने अपने बच्चों को निगल लिया और इसे तरक्की का नाम दिया।
मैं ये लिखना नहीं चाहता।
मैं इसे भूलना चाहता हूँ।
मैं उस लड़के को भूलना चाहता हूँ जिसने फर्श चाटा।
मगर मैं नहीं भूल सकता।
क्योंकि मैंने उसे देखा।
क्योंकि वो हक़ीक़ी है।
क्योंकि वो मेरे लिखे सारे शब्दों से ज़्यादा हक़ीक़ी है।
और क्योंकि अगर मैं उसे भूल गया, तो मैं इंसान नहीं रहूँगा।
© गाजा से डॉ. एज़्ज़िद्दीन
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