पुष्पेंद्र यादव पुष्प

साक्षात्कार
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——- साहित्य समाज का दर्पण बदलेगा समाज होगा उजाला
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साहित्य समाज का दर्पण है काल और परिस्थितियों की समीक्षा करना साहित्यकार की नैतिक जिम्मेदारी होती हैं! साहित्य शब्द बहुत ही व्यापक है जिसमें समूची समाज का दर्द विकास उन्नति सम्मानित है यहां तक की साहित्य वह दर्पण है जो अंधकार को क्या कर उजाला करता है साहित्य समानता के लिए साहित्य सामाजिक परिवर्तन के लिए साहित्य राष्ट्र की एकता के लिए लिखा जाता है वही साहित्य समाज का दर्पण बन जाता है यह विचार युवा कवि पुष्पेंद्र यादव पुष्प ने डी न्यूज़ सुपरफास्ट समाचार बेवसाइट के चीफ एडिटर राकेश रागी से विशेष भेंट के दौरान व्यक्त किये!
उन्होंने कहा कि साहित्य की विधाएं अलग-अलग हैं कौन साहित्य क्या लिखता है यह उसकी सोच पर निर्भर करता है काल और परिस्थितियों का आकलन करके लिखने वाले साहित्यकार का लेखन चिरजीवी हो जाता है साहित्य लिखने का भी हर युग में एक विशेष समय रहा है भक्ति युग में रामायण लिखी गई जिसे आज भी लोग पढ़ते हैं लेकिन आज की साहित्यकारों को लोग क्यों नहीं पढ़ते हैं इसका भी आकलन होना चाहिए समय की कमी है ऐसा कहकर हम अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते हैं कहीं ना कहीं हमारे साहित्य में समाज का दर्द नहीं है इसलिए समाज में उसी जगह नहीं मिल पा रही है।
श्री पुष्प ने कहा कि देश के अंदर लेखन की कमी नहीं है जनवादी प्रगतिशील सोच के लोग बहुत अच्छा लिख रहे हैं नई पीढ़ी के लोगों में भी कई एक अच्छी लिखने वाले हैं परंतु साहित्य में परिवर्तन का आगाज होना बहुत जरूरी है वर्तमान परिस्थितियों हमें क्या चुनौती दे रही है उसकी विषय वस्तु हमारे साहित्य में दिखाई देनी चाहिए जिसे हम चुनौती के रूप में स्वीकार कर उससे निपटने का संकल्प हमारे साहित्य में उदघोषित होना चाहिए तभी हम अपने साहित्य को चिरंजीवी बना सकेंगे तभी हमारा साहित्य समाज का दर्पण बन सकेगा!
उन्होंने कहा कि आज समाज और देश में विसंगतियों की कमी नहीं है महंगाई बेरोजगारी भ्रष्टाचार शिक्षा स्वास्थ्य तमाम ऐसे क्षेत्र हैं जिम कमियां है उन कमियों को उजागर करने की आवश्यकता है बदलाव लाने के लिए हमें दिशा देने के लिए नए तरीके से सोच विकसित करनी होगी तभी हम नए पाठक नए श्रोता और नए तेवर लेकर समाज की बदलाव की बात कर सकेंगे!
