साक्षात्कार
————
साहित्य असमानता को बेनकाब कर समानता की नींव का बनता है पत्थर अमन चैन का देता हैं संदेश
——————————————-
साहित्य को समाज का दर्पण क्यों कहा गया है पहले हम इस बात को स्पष्ट कर देते हैं साहित्य समाज में व्याप्त उच्च नीच भेदभाव और आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक विषमताओं को बेनकाब कर एक ऐसे समाज की स्थापना की ओर आम आदमी को करने का प्रयास करता है जो समाज शोषण मुक्त हो जिस समाज में आपसी भाईचारा हो आर्थिक विपन्नता ना हो ऐसे समाज के निर्माण में साहित्य हम भूमिका निभाता है तभी तो साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है यह विचार वरिष्ठ रचनाकार सत्येंद्र निर्झर ने ध्वज भारती समाचार पत्र के जिला प्रतिनिधि राकेश रागी ने विशेष भेंट के दौरान व्यक्त किये!
उन्होंने अपनी एक रचना के माध्यम से सामाजिक संरचना मैं व्याप्त आर्थिक भेदभाव को किस तरीके से प्रस्तुत किया है देखिए_____
जंगल में दरबार लगा है आया नया नया फरमान !
ऊंट चलेंगे सारा जंगल भेड़ के हिस्से जय सियाराम!
सच मानिए यही हो रहा है। चंद लोगों के हिस्से में सारा देश है और सारे देश की भेड़ बकरियां शोषित पीड़ित लोग जय श्री राम बोल रहे है। उन्हें अपने अधिकारों की जानकारी नहीं है वह धार्मिक राष्ट्रवाद की आंखों पट्टी बांध रखी है। जिसकी बजह से उसे जो वोलने कहा जाता हैं। वही कहता है। साहित्य इसी अंधता को दूर करने का काम करता है। वह समाज को दिशा देकर जागरूक करने का काम करता है ताकि समाजिक सामानता बनी रहे इतनी ऊंच नीच नहीं होनी चाहिए जो मानव के द्वारा मानव का शोषण करने की परंपरा जारी बनी रहे!
श्री निर्झर ने अपनी एक रचना में कहा कि _______
शाकाहारी सबक शेर चीते भालू सिखलाएंगे!
बकरी की रक्षा में अब भेडिये लगाए जाएंगे!
इन पंक्तियों में कवि ने स्पष्ट कर दिया है कि सामाजिक सुरक्षा की जिम्मेदारी ऐसे हाथों में होगी जो बहुमत की जनता को बकरी समझ कर कभी भी मरोड़ सकता है साहित्य में समानता का भाव ही साहित्य को दिशा बोधक बनता है श्री निर्झर ने अपनी रचना में सामाजिक असमानता को जिस तरीके से शब्द दिए हैं उन शब्दों में जान है और शब्दों में दिशा भी है तभी तो हम एक बात कहते हैं की शब्दों की संरचना से ही साहित्य का जन्म होता है और जिस साहित्य में समाज का दर्द होता है वही साहित्य समाज के लिए दर्पण बन जाता है!
कवि श्री सतेन्द्र निर्झर का कहना है कि साहित्य का सृजन किसी भी विधा में किया जा सकता है व्यंग हो चाहे हास्य हो या फिर वीर रस में रचना लिखी गई हो रचना की विषय वस्तु मायने रखती है रचना की विषय वस्तु ही रचना को कालजयी बनती है और समाज को दिशा देकर रचना अमरत्व को प्राप्त करती है। ऐसी ही रचनाएं साहित्य की श्रेणी में आती है और वही साहित्य समाज के लिए दर्पण बन जाता है इसलिए साहित्यकारों का दायित्व बनता है कि काल और परिस्थितियों का आकलन करके साहित्य का सृजन करें जो समाज को दिशा दे सके!