इस समय सारे देश के अंदर राम मंदिर को लेकर चर्चाएं तेज है और राम मंदिर का उद्घाटन इस समय राष्ट्रीय मीडिया का मुख्य विषय बना हुआ है एक तरफ धर्म की राजनीति दूसरी तरफ राजनीति में धर्म का प्रवेश इन बातों पर भी बड़ी पैमाने पर चर्चा हो रही है लेकिन जिसे घुमाया जा रहा है
जिस तरीके से धर्म का सारा लेकर राजनीतिक वातावरण तैयार किया जा रहा है वह साफ दर्शा रहा है कि पूंजीवादी व्यवस्था साम्राज्यवाद में प्रवेश कर गई है जो डगमग आ रही है बचाने के लिए शासक वर्ग धर्म का सहारा ले रहे हैं जिसमें पूंजीपति राजनेता और कुछ धर्म आचार्य शामिल है जो राजनीतिक लाभ लेने के लिए एक नया आडंबर डरते रहते हैं
जिस देश में संविधान धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक व्यवस्था की वकालत करता हूं उसे देश में धर्म के आधार पर राजनीति को बढ़ावा देना कहां तक शुभ है यह चर्चा का विषय है परंतु जनवादी प्रगतिशील सोच कभी लेखक और साहित्यकारों के मुंह पर ताला पड़ा हुआ है वह कुछ भी बोलने से डर रहे हैं
अगर हालात यही रहे तो राजनीति धर्म की हो या फिर राजनीति में धर्म का प्रवेश हो बाद एक ही है धार्मिक आयोजनों के आधार पर लोगों की आस्थाओं से खिलवाड़ होती रहेगी चुनाव जीते जाते रहेंगे जनवादी प्रगतिशील खेमा सिर्फ सेमिनार और गाल बजाने में मस्त रहेगा अब उसके बस की कोई बात नहीं रही है क्योंकि जिसके पास संसाधन है वहीं चुनाव लड़ सकेगा और जीत सकेगा फासीवादी तकते हैं अपना जाल पसार चुकी है जिसे समेट पाना अब मुश्किल होता जा रहा है
