
संपादक
भारत जैसे लोकतांत्रिक और बहुधर्मो के देश में मार्क्सवाद प्रासंगिक है एक अपना बहुत कठिन होता जा रहा है धार्मिक विविधताओं और मतमतांतरों पूजा पद्धतियों व्रत उपासना वाले देश में मार्क्सवाद कैसे अपनी प्रासंगिकता साबित करेगा यह सवाल हर मार्क्सवादी के सामने मोबाइल खड़ा हुआ है और मार्क्सवादियों ने अपनी आंखें बंद कर ली है वह मार्क्सवाद के नाम पर केवल सिद्धांत की जुगाली करते रहते हैं इसके अलावा उनके पास कोई काम नहीं है अगर कोई एक काम और है तो वह है लोगों को दलगत भावनाओं के आधार पर गालियां देना है
भारत में मार्क्सवाद की प्रासंगिकता पर चर्चा करने से भी मार्क्सवादी कतराते हैं उन्हें डर लगता है कहीं हम जिस सिद्धांत की रात दिन जुगाली करते हैं उसकी पोल ना खुल जाए सिर्फ मार्क्सवादी माला रखने से परिवर्तन का सपना पूरा होने वाला नहीं है कल और परिस्थितियों का आकलन करना जिन्हें बिल्कुल नहीं आता वह मठाधीश बन बैठे हैं
वर्तमान परिस्थितियों का अगर आकलन किया जाए तो सारा देश राम मंदिर के उद्घाटन की तरफ देख रहा है ऐसी समय में वैज्ञानिक सोच रखने वाले प्रगतिशील जनवादी सोच रखने वाले कवि लेखक अपनी जुबान नहीं खोल पा रहे हैं जो अपने आप को गर्व से मार्क्सवादी कहते हैं इससे तो ऐसा लगता है कि मार्क्सवाद भारत के संदर्भ में भारत की परिस्थितियों में अप्रासंगिक होता जा रहा है या फिर यूं कहा जाए कि अप्रासंगिक था
मुझे तो यह कहने में भी चेक नहीं हो रही है आने वाले समय में मार्क्सवाद माला रखने वाले अपने हाथों में राम नाम की माला लेकर भगवा गैंग में खड़ी दिखाई देंगे इसके अलावा भारत में कोई रास्ता भी दिखाई नहीं पड़ रहा है इसका मुख्य कारण यही है किस सिद्धांत जुगाली करने वाली जनता से नफरत करते हैं वह अपने सिद्धांत के बल पर परिवर्तन लाना चाहते हैं वह जनता के बीच में नहीं जाना चाहते हैं
