____चोर दरवाजे से चुनावी चंदा,मतलब चुनावी बांड
____ चुनावी बांड पर सुप्रीम कोर्ट क्या लेगा निर्णय चीफ जस्टिस चंद्रचूड ने दिए संकेत
_____ _सुप्रीम को कर सकता है लीपापोती उचित निर्णय की नहीं उम्मीद
_____ केंद्र सरकार की इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को सुप्रीम कोर्ट ने दिया था असंवैधानिक क़रार
________ चुनावी बांड स्कीम के तहत जनवरी 2018 और जनवरी 2024 के बीच 16,518 करोड़ रुपये के इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे गए थे और इसमें से ज़्यादातर राशि राजनीतिक दलों को चुनावी फंडिंग के तौर पर दी गई थी.! पिछले कुछ सालों में सामने आई रिपोर्ट्स में ये पता चला कि इस राशि का सबसे बड़ा हिस्सा केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को मिला था. इन बॉन्ड्स पर पारदर्शिता को लेकर कई सवाल उठ रहे थे और ये आरोप लग रहा था कि ये योजना मनी लॉन्डरिंग या काले धन को सफ़ेद करने के लिए इस्तेमाल हो रही थी.
चुनावी चंदा यानी चुनावी बॉंड के मामले में सुप्रीम कोर्ट का क्या फ़ैसला आएगा, यह तो पहले ही चंद्रचूड़ ने साफ़ कर दिया है. उनके अनुसार ‘अगर चंदा देने वालों का नाम ज़ाहिर हो जाए तो अगर सरकार बदल गई, तो नई सरकार उन पर बदले की कारवाई करेगी.!’
मतलब, क्रिमिनल लोगों की सरकार को दूध पिला कर ज़िंदा रखने वाले लोगों पर कोई सरकार कारवाई न करे, यह सुनिश्चित करना सुप्रीम कोर्ट का परम लक्ष्य है.!!
दूसरी तरफ़, *सरकार का कहना है कि अव्वल तो ‘जनता को चुनावी बांड के वारे जानने का हक़ ही नहीं है कि किस राजनीतिक दल को किसने कितना चंदा दिया है’* और दूसरे यह कि, ‘चूँकि स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया से चुनावी बॉंड बिके हैं, इसलिए किसी सरकार को यह मालूम चल ही जाएगा कि किसने और किसके लिए ये बॉंड खरीदे.!!
अगर किसी भी सरकार वैसे भी मालूम चल जाएगा, तो मी लॉर्ड कोर्ट के सामने नाम आने से क्या फ़र्क़ पड़ जाएगा ? कहीं ऐसा तो नहीं है कि मी लॉर्ड जानते हैं कि क्रिमिनल, येन तेन प्रकार से, हिटलर की तर्ज़ पर आगामी चुनाव जीत कर सत्ता हासिल कर लेंगे और इसलिए ज़्यादा पंगा लेना भारी पड़ सकता है ?*
कहीं ऐसा तो नहीं है कि मी लॉर्ड समझ रहे हैं कि जनता अब बदलाव के मूड में है और ऐसे में अपने वर्ग हित में अपने वर्ग के लोगों को यथासंभव बचाने की ज़िम्मेदारी उन पर आन पड़ी है ?
सरकार कहती है कि जनता को यह अधिकार ही नहीं है कि किसने किस दल को और किस लाभ के लोभ में चंदा दिया है!’ मतलब सरकार किन उद्योगपति घरानों की दलाली करने के लिए चुनी गई है, यह जानने का अधिकार जनता को नहीं है. प्रकारांतर में संविधान नहीं, अब सरकार यह तय करेगी कि जनता के क्या क्या अधिकार हैं!*
क्या आपने कभी सोचा है कि जनता के वोट से चुनी हुई सरकार को यह कहने की जुर्रत संविधान के रखवाले सुप्रीम कोर्ट के सामने कैसे हुई ? सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस से भी न्याय की उम्मीद करना नासमझी होगी बदलाव चाहने वालों को एक होकर लड़ना ही होगा और दूसरा कोई विकल्प बाकी नहीं बचा हैं!
