“दुष्यंत कुमार अपने जमाने के नए युवकों की आवाज़ हैं”, ऐसा कहना था निदा फ़ाज़ली का। दुष्यंत कुमार ने अपनी ग़ज़लों से क्रान्ति ला दी थी, उनकी रचनाएं वो संचार थीं जिन्होंने समाज के पिछड़े वर्गों को जागरूक किया। पेश है दुष्यंत की ग़ज़लों से 20 चुनिंदा शेर….
वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है !
माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है !
रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया !
इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारों !
आज वीरान अपना घर देखा, तो कई बार झाँक कर देखा !
पाँव टूटे हुए नज़र आए, एक ठहरा हुआ खंडर देखा !
बहुत क़रीब न आओ यक़ीं नहीं होगा !
ये आरज़ू भी अगर कामयाब हो जाए !
कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता !
एक पत्थर तो तबीअ’त से उछालो यारों!
ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए !
एक गुड़िया की कई कठ-पुतलियों में जान है !
आज शाइ’र ये तमाशा देख कर हैरान है
ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए !
ये हमारे वक़्त की सब से सही पहचान है !
गूँगे निकल पड़े हैं ज़बाँ की तलाश में
सरकार के ख़िलाफ़ ये साज़िश तो देखिए
ये नज़र है कि कोई मौसम है
बरसात आ गई तो दरकने लगी ज़मीन !
सूखा मचा रही है ये बारिश तो देखिए !
ये नज़र है कि कोई मौसम है !
ये सबा है कि वबाल आया है!
पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं !
कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं !
आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है !
आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है !
पत्थरों में चीख़ हरगिज़ कारगर होगी नहीं !
इन ठिठुरती उँगलियों को इस लपट पर सेंक लो !
धूप अब घर की किसी दीवार पर होगी नहीं !
रोज़ जब रात को बारह का गजर होता है
यातनाओं के अँधेरे में सफ़र होता है
सिर से सीने में कभी पेट से पाँव में…
सिर से सीने में कभी पेट से पाँव में कभी
इक जगह हो तो कहें दर्द इधर होता है
ऐसा लगता है कि उड़ कर भी कहाँ पहुँचेंगे !
हाथ में जब कोई टूटा हुआ पर होता है !
वो कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तुगू
मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है
सामान कुछ नहीं है फटे-हाल है मगर
सामान कुछ नहीं है फटे-हाल है मगर
झोले में उस के पास कोई संविधान है
लोग हाथों में लिए बैठे हैं अपने पिंजरे
आज सय्याद को महफ़िल में बुला लो यारो
जैसे किसी बच्चे को खिलोने न मिले हों
फिरता हूँ कई यादों को सीने से लगाए
_______ दुष्यंत कुमार की लेखनी को बारम्बार प्रणाम!
