________ गाँधी , उस दिन कौन मरा …??
गाँधी को मारना , असहमति को मारना है । लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धान्त को मारना है । हत्यारे गोड़से गली-गली फिरने लगे हैं और अब तो राज सिंहासन पर भी जा बैठे हैं । इनके लिए उन माँओं को मारना तो बेहद जरुरी होता ही है जो सत्ता के आपराधिक गठबंधन की खिलाफत को आवाज़ दे रहे बद्गुमान पागल बेटों को जन्म दे बैठी हैं ! या जन्म देने की सम्भावनाओं से परिपूर्ण हैं !
आंदोलनों , सत्याग्रहों और सत्याग्रहियों के दमन (और कत्ल भी !) के लिए किसी पैशाचिक सोच से भरे गोडसे (जिसने पकड़े जाने पर अपनी पहचान मुस्लिम के रूप में बताई ताकि हिंदू-मुस्लिम दंगे का षड्यंत्र भी आगे बढ़ सके) की तरह इन्हें अब अपने हाथ में पिस्तौल उठाने की जरूरत नहीं है , क्योंकि इन्होंने सत्ता की ताक़त के दम पर “कानून” को ही खंजर और पिस्तौल में बदल कर “तन्त्र” के हाथों में पकड़ा रखा है ।
ये किस-किस को मारेंगे , यही वक़्त का सबसे ज्वलंत प्रश्न है । ज़बाब देने की जिम्मेदारी हम सबकी है । इस ज़बाब से बढ़कर गाँधी के प्रति कोई श्रद्धांजलि नहीं हो सकती । …. आओ कोशिश करें ।
गाँधी पर जारी हमला असहमति / अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता , सांस्कृतिक-धार्मिक-वैचारिक भिन्नता और मानवीयता पर हमले की कुचेष्टाएं हैं । आज भी इन कुचेष्टाओं पर रहती हर एक चुप्पी गुनाहगार है ।
“गांधी” को मारने की कुचेष्टाएँ हर युग में मिल जाएंगी । आततायियों ने तो गाँधी को बार-बार मारा लेकिन गाँधी “शरीर” के अलावा भी बहुत-कुछ थे , इसलिए ही तो शरीर के अलावा उनके विचार , प्रयोग और पदचिह्न अमिट हैं ।
अल्बर्ट आइंस्टीन को जब-जब लगा कि विज्ञान और एकतरफा तर्कवाद मानवजाति के लिए संकट बन सकता है, तब-तब उनके सामने गांधी का जीवन एक आदर्श के रूप में आता रहा ।
साधन और साध्य की पवित्रता के साथ-साथ सत्याग्रह की पहल, …. बहुत बड़ी देन है गाँधी की ।
ध्यान से सुनना कभी , ऐसी ही पहल में गाँधी के दिल की धड़कन सुनाई देगी ।
….आज बलिदान दिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि …!!
………………… – राजेश भारत !!
