____ आलोचना और आत्म आलोचना मनुष्य के सुधार के अचूक अस्त्र शस्त्र सबक ले अपने को सुधारने की करें कोशिश !!
बीजेपी सरकार की नीतियों की ,खामियों की कोई आलोचना कर दे तो अंधभक्तों की नजर वो न तो हिन्दू है,न तो वो सच्चा संत है और न ही देशभक्त… इस परसेप्शन को सेट करने में सबसे बड़ा हाथ अंबानी अडानी की खरीदी हुई मीडिया का है। इस जाहिल सोच से जो भी ग्रसित हैं उसे तुरंत इलाज की जरूरत है। हर विद्वान व्यक्ति यही कहेगा कि आलोचना से सुधार आता है न कि नुकसान होता है। अगर आप आलोचना सुन नहीं सकते तो निश्चित ही आपके अंदर का इंसान मर रहा है और जानवर में तब्दील हो रहा है। ऐसे व्यक्तियों को आत्म आलोचना के द्वारा अपने अंदर छांकना चाहिए ताकि मरी हुई आत्मा में चेतना का संचार हो सके !!
साथियों मर्यादित शब्दों में की गई आलोचना का हमेशा सम्मान होना चाहिए।आलोचना अगर कोई मुंह करता हैं तो उसे गम्भीरता से लेकर उस पर चिंतन मनन कर अपने आचरण में सुधार करने के प्रयास करने चाहिए क्योंकि सामने आलोचना करने वाला सबसे बड़ा शुभचिंतक होता है हर व्यक्ति मुंह आलोचना करने का साहस नहीं जुटा पाता हैं!
अगर बात करें आंखों पर किसी के नाम की पट्टी बांधकर दूसरों के इशारे पर सुनने और बोलने वाले अंध भक्तों की उन्हें परजीवी कहा जा सकता है क्योंकि उनके दिमाग ( ब्रेन )को एक सांचे में ढाल दिया जाता है जिससे उनकी सोचने समझने की शक्ति समाप्त हो जाती हैं। उनका सोचने समझने का जो सीमित दायरा होता हैं। उनका दिमाग उस दायरे की दीवारों को तोड़ने की सोच भी नहीं सकता हैं। इसी लिये इन विशेष तरह के लोगों को अंधभक्त कहा जाता है!!
आपको बताते चलें दो हजार चौदह के बाद से एक नई अंधभक्तों की प्रजाति पैदा हुई हैं। जो सच को सच न कहना चाहती और ना ही सुनना चाहती है। इस प्रजाति व्यक्ति धार्मिक अंधता के शिकार है जो दिन रात अपने आका के द्वारा भरी गई चावी के अनुसार बोलते है हमेशा आपसी भाईचारा साम्प्रदायिक सद्भाव के खतरा पैदा करने का काम करते हैं। यही नहीं यह व्यक्ति अपनी धार्मिक अंधता की तलवार से हत्या करने पर उतर आते हैं !!
यहां एक बात और स्पष्ट करते चले यह जो अंधभक्त कहे जाने वाले व्यक्ति तो समाज के लिए खतरनाक तो है ही इनसे अधिक वह लोग खतरनाक है जो समाज में सामाजिक एकता साम्प्रदायिक सद्भाव कायम करने का चोला ओढ़कर मुंह बंद करके चुप बैठे हैं! अपने दायित्व ईमानदारी से सिर्फ़ इस लिए नहीं निभा पा रहे है। उन्हें डर है कहीं कोई अंधभक्त हमला न कर दे दूसरा डर उन्हें सरकारी मशीनरी से भी है वह दबी जुबान से सिर्फ इतनी सी बात कह पा रहे हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में हैं सरदार के खिलाफ बोलना ठीक नहीं है। ऐसे लोगों जगाने की जरूरत है। सच को सच कहने की आवश्यकता है तभी हम एक स्वच्छ समाज की स्थापना कर सकते है।
