_______ धर्म का नाम लेकर घृणित पाप के गड्ढे खोदने वालों की संख्या घृणित रक्त-बीज की तरह बढ़ रहीं….!!
______ इस धर्म के ढोंग के खिलाफ, इस धार्मिक तुनुकमिजाजी के खिलाफ जिहाद की जरूरत __ गणेश शंकर विद्यार्थी
नई दिल्ली. ..!!
अब हालत इतनी नाजुक हो गई है कि बिना जिहाद के काम चलता नहीं दिखाई देता। धर्म का नाम लेकर घृणित पाप के गड्ढे खोदने वालों की संख्या घृणित रक्त-बीज की तरह बढ़ रही है। पहले भी समाज में धर्म ढोंगी रहे हैं। हमेशा से वे रहते आये हैं। मनुष्य न तो कभी पूर्ण निभ्रांत था और न अभी शायद बहुत दिनों तक वह इस अवस्था को प्राप्त होगा ही, लेकिन समाज में कुछ ऐसे युग आते हैं, जिनमें मिथ्या धर्म और परिपाटी की भावना बहुत बलवती और देशव्यापिनी हो जाती है। ऐसे ही अवसरों पर हाथ में तलवार लेकर निकल पड़ने की जरूरत होती है
आज हमें जिहाद करना है- इस धर्म के ढोंग के खिलाफ, इस धार्मिक तुनुकमिजाजी के खिलाफ। जातिगत झगड़े बढ़ रहे हैं। खून की प्यास लग रही है। एक-दूसरे को फूटी आंखों भी हम देखना नहीं चाहते। अविश्वास, भयातुरता और धर्माडंबर के कीचड़ में फंसे हुए हम नारकीय जीव यह समझ रहे हैं कि हमारी सिर-फुड़ौवल की लीला से धर्म की रक्षा हो रही है। हमें आज शंख उठाना है उस धर्म के विरुद्ध जो तर्क, बुद्धि और अनुभव की कसौटी पर ठीक नहीं उतर सकता।
सहारनपुर में झगड़े का आसन्न कारण क्या था? यही न कि पीपल की एक डाली अलम के झंडे में अड़ती थी। पामर! ढोंगी! पशु! किस धर्म के किस तर्क और बुद्धि के बल पर हम पीपल की डाली को अकाट्य और अछेद्य समझें? क्या किसी धर्म में ऐसा लिखा है? और यह परिपाटी, यह बाबा वाक्य ही क्या धर्म है? ऐसे धर्म का नाश, सर्वनाश, होना चाहिये। मूर्ख जाहिल मुसलमान अलम के झंडे को जब तक एक हजार फीट का-इतना ऊंचा कि वह सातवें आसमान की छत से जाकर टकराए- न बनायेंगे, तब तक उनका धर्म नहीं निभेगा, क्यों? इस बेहूदगी का, इस नीचता का भी कुछ ठिकाना है? और इन्हीं बातों में सिर फूटें! हमें क्या हो गया है? हिंदू लोग अपनी छाती पर दकियानूसी रस्मो-रिवाज का पत्थर रखे बैठे हैं। वे समझते हैं कि हम धर्म की रक्षा कर रहे हैं। यदि आज साक्षात् भगवान श्रीकृष्घ्ण भी आकर हम धर्मढोंगियों को समझायें कि जो कुछ हम कर रहे हैं – विधवाओं, अछूतों, विवाहादि संस्कारों, जाति-पांति के पाशविक अस्वाभाविक बंधनों आदि को अलंध्य संस्थाओं का रूप देकर हम जिस धर्म की रक्षा का पाखंड रचते रहे हैं- वह वास्तव में धर्म नहीं, अधर्म और महान अधर्म है…!!
.. हमें विश्घ्वास है कि हम उनकी बात न मानेंगे। उसके प्रतिकूल हम अपनी छाती पर रखे हुए पत्थर को इस रूढि़-पूजा की शिला को और अधिक दुलार से चिकाएंगे और शायद रोकर कहेंगे, ‘अरे, मेरे अच्छे शिलाधर्म! मैं तुझे न छोडूंगा।’ जब अवस्था ऐसी हो रही है तब भला धर्म के ढोंग के विरुद्ध जिहाद न छेड़ा जाये तो और क्या हो! मस्जिदों के सामने बाजा न बजाओ, क्योंकि इबादत में खलल पड़ता है।
बंगाल में ऐसा कभी नहीं हुआ। मस्जिदों के सामने न तो कोई ‘हरि बोल’ की ध्वनि कर सकता है और न ‘रामनाम’ की। वहां यह रिवाज है। मिस्टर गजनवी अब यह एक नया शिगूफा छोड़ रहे हैं। हम पूछना चाहते हैं कि यह सब जो हो रहा है, अथवा बंगाल में, यह मानकर भी कि उनका कथन सत्य है, जो कुछ होता रहा है, क्या वह धर्म की रू से जायज है? क्या इस बाजे-गाजे और हरि बोल रोकने-रुकवाने ही में धर्म? हम इस धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध जिहाद छेड़ना चाहते हैं। हम न तो ऐसे धर्म को धर्म कहते हैं और न ऐसी मूर्खता को धर्म-स्नेह के नाम से पुकारने को तैयार हैं। चाहे हिंदू हों या मुसलमान, यदि वे अपने वाक्यों को तर्क, बुद्धि और अनुभव-ज्ञान के बल पर पुष्ट नहीं कर सकते तो हम उन कार्यों को ढकोसला कहेंगे।
भारतवासियों! एक बात सदा ध्यान में रखो। धार्मिक कट्टरता का युग चला गया। आज से 500 वर्ष पूर्व यूरोप जिस अंधविश्वास, दम्भ और धार्मिक बर्बरता के युग में था, उस युग में भारतवर्ष को घसीट कर मत ले जाओ। जो मूर्खताएं अब तक हमारे व्यक्तिगत जीवन का नाश कर रही थीं, वे अब राष्ट्रीय प्रांगण में फैल कर हमारे बचे-खुचे मानव-भावों का लोप कर रही हैं। जिनके कारण हमारा व्घ्यक्तित्व पतित होता गया, अब उन्हीं के कारण हमारा देश तबाह हो रहा है।
हिंदू-मुसलमानों के झगड़ों और हमारी कमजोरियों को दूर करने का केवल एक यही तरीका है कि समाज के कुछ सत्यनिष्ठ और सीधे दृढ़ विश्वासी पुरुष धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध जिहाद शुरू कर दें। जब तक यह मूर्खता नष्ट न होगी, तब तक देश का कल्याण न होगा। समझौते कर लेने, नौकरियों का बंटवारा कर लेने और अस्थायी सुलहनामों को लिखकर हाथ काले करने से देश को स्वतंत्रता न मिलेगी। हाथ में खड्ग लेकर, तर्क और ज्ञान की प्रखर करवाल लेकर, आगे बढ़ने की जरूरत है। जिन हाथों में शक्ति है, उनसे हम यह पुण्य कार्य आरंभ करने का अनुरोध करते हैं। एक ऐसे संघ के बनने की आवश्यकता है जो किसी की लगी-लिपटी न कहे, जो सदा सत्य पर अटल रहे। मुक्ति का मार्ग यही है। पाप के गड्ढे राष्ट्र के राजमार्ग पर खोदना चाहिये, क्योंकि भारत की राष्ट्रीयता का रथ उस पर होकर गुजर रहा है। हम चाहते हैं कि कुछ आदमी ऐसे निकल आवें जिनमें हिंदू भी हों और मुसलमान भी जो कि इन सब मूर्खताओं को, जिनके हिंदू और मुसलमान दोनों शिकार हो रहे हैं, तीव्र निंदा करें।
यह निश्चय है कि पहले-पहल इनकी कोई न सुनेगा। इन पर पत्थर फेंके जायेंगे। ये प्रताडि़त और निंदा-भाजन होंगे। पर, अपने सिर पर सारी निंदा और सारी कटुता को लेकर जो आगे आना चाहते हैं, उन्हीं को राष्ट्र यह निमंत्रण दे रहा है।
