________ लाल सलाम … फासीवादियों को ‘लाल सलाम’ से इतनी घबराहट क्यों…??
नई दिल्ली. .!!
“तुम फूलों को मसल सकते हो,
लेकिन वसंत को आने से नहीं रोक सकते।”
— पाब्लो नेरुदा, चिली के क्रांतिकारी कवि
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने हाल ही में यह ऐलान किया कि “लाल सलाम वालों को जीने नहीं देंगे।”
यानि अब इस देश में हक़ और बराबरी की बात करना भी जुर्म है।
अब अन्याय के ख़िलाफ़ नारे लगाने से भी जान पर बन आयेगी। ये वही नारे हैं जिन नारों ने अंग्रेज़ों की नींव हिला दी, जिन विचारों से दुनिया भर के साम्राज्य कांप उठे — उनसे आज ये फासीवादी भगवाधारी सत्ता थर-थर काँप रही है।
लेकिन मोहन यादव का डर वाजिब है। क्योंकि “लाल सलाम” “इंक़लाब-ज़िंदाबाद“ सिर्फ़ एक नारे नहीं, एक विचारधारा है — एक ऐसी आग जो मज़दूर की मुट्ठियों से भड़की थी, और तानाशाहों के तख़्त तक पहुँची थी। एक ऐसा सपना जो सिर्फ़ किताबों में नहीं, तेभागा और नक्सलबाड़ी की मिट्टी में पला है। एक ऐसा आंदोलन जिसने रूस में ज़ार, चीन में सम्राट, क्यूबा में तानाशाह, वियतनाम में अमेरिकी साम्राज्यवाद और भारत में अंग्रेज़ों और सामंतवाद के छक्के छुड़ाये थे।
सुन लीजिये मोहन यादव— जब तक इस धरती पर शोषण है, उत्पीड़न है, अन्याय है, ग़ैर-बराबरी है, लाल सलाम का नारा भी रहेगा, और लाल झंडा भी लहराता रहेगा।
आज एक तरफ़ आप जैसे फासीवादी लोग हैं जिनका कायरतापूर्ण इतिहास रहा है।
जो हिटलर के अनुयायियों को अपना ‘आइकॉन’ मानते हैं।
जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई में अंग्रेज़ों का साथ दिया।
जो लोकतांत्रिक मूल्यों की जगह मनुस्मृति का पाठ पढ़ाते हैं।
जिनके लिए ‘देश’ का मतलब सिर्फ़ ‘धर्म’ है, और ‘विकास’ का मतलब सिर्फ़ चंद पूंजीपतियों का मुनाफा और व्यापार है।
और दूसरी तरफ़ हैं वे क्रान्तिकारी, जो इतिहास बनाते हैं।
जिनके विचारों से जमींदार कांपे, साम्राज्य ढहे, और सत्ता की चूलें हिलीं।
जिन्होंने तेभागा, तेलंगाना, और नक्सलबाड़ी में किसानों को हक़ दिलाया।
जिन्होंने लेनिन के नेतृत्व में रूस में ज़ारशाही का खात्मा किया,
माओ के नेतृत्व में चीन में सामंतों और युद्ध सरदारों को उखाड़ फेंका,
चे ग्वेवारा-फिदेल कास्ट्रो के साथ क्यूबा की तानाशाही को गिराया,
भगत सिंह के विचार और बलिदान ने अंग्रेज़ी हुकूमत को दहला दिया,
और बिरसा मुंडा ने जंगलों से सत्ता को चुनौती दी।
अब आप बताइये — आपको डर किससे है?
क्या कुछ बंदूकधारी नक्सलियों से?
नहीं!
आपका डर—
हर उस युवा से है जो सवाल करता है।
हर उस महिला से जो बराबरी का हक़ माँगती है।
हर उस मज़दूर से जो यूनियन में शामिल होता है।
हर उस आदिवासी से जो अपनी ज़मीन बचाने के लिए खड़ा होता है।
आपको डर है क्रान्तिकारी विचार से, डर है लाल सपने से, डर है उस “लाल सलाम” से जो पूँजीवादी व्यवस्था की नींव हिलाने का दम रखता है।
तो समझ लीजिए — लाल सलाम क्या है?
ये कोई डरने वालों का नारा नहीं,
ये संघर्ष की ज्वाला है,
ये यकीन है इंसानियत में,
ये विरोध का रंग है,
ये वो आवाज़ है जो कहती है:
“शोषण बंद करो, हक़ दो, बराबरी दो, इंसाफ़ दो!”
आप क्या कर सकते हैं?
आप कुछ क्रांतिकारियों को जेल में डाल सकते हैं,
कुछ आवाज़ों को गोलियों से खामोश कर सकते हैं,
कुछ किताबों को बैन कर सकते हैं,
कुछ सोशल मीडिया पोस्ट डिलीट कर सकते हैं।
लेकिन आप विचारों को नहीं मार सकते।
आप क्रांति को नहीं कुचल सकते।
आप लाल सलाम को नहीं मिटा सकते।
मोहन यादव और उनके आकाओं, सुन लीजिए:
इस विचारधारा को
अंग्रेज़ नहीं रोक पाए,
हिटलर नहीं दबा सका,
मैक्कार्थीवाद थक के बैठ गया —
तो आप क्या चीज़ हैं?
इतिहास में जितने भी तानाशाह आए,
हर किसी ने सोचा — अब क्रान्तिकारी विचारधारा खत्म हो जाएगी।
मगर हर बार क्रान्ति के विचार जीते और सत्ता हारी।
इसलिए, हम फिर कहेंगे — लाल सलाम!
तब तक कहेंगे लाल सलाम!
जब तक मज़दूर शोषित है,
जब तक किसान आत्महत्या करता है,
जब तक आदिवासी से ज़मीन छीनी जाती है,
जब तक दलित को इंसान नहीं समझा जाता,
जब तक महिलाओं को सम्मान और सुरक्षा नहीं मिलती —
तब तक हम “लाल सलाम” कहते रहेंगे।
क्योंकि लाल सलाम सिर्फ़ अतीत की याद नहीं,
आने वाले समाज की घोषणा है।…..धर्मेन्द्र आज़ाद
