_____आज के दौर में नौजवानों से चंद बातें…!!!
(एक तूफानी भविष्य के नाम)
चलो, कुछ बातें करें —
तुमसे — जो अब भी सपना देख सकते हो
इस नींद में डूबे दौर में
जहाँ हर नींद बेच दी गई है…
जहाँ हर सपना गिरवी है…
जहाँ हिम्मत का मतलब बन गया है — ‘करियर’
और विद्रोह का मतलब — ‘कमेंट बॉक्स’।
तुमसे, जो अब भी बेचैन हो
जब कोई बच्चा कचरे में रोटी ढूँढता है
जब कोई औरत भूख से बदन बेचती है
जब कोई मज़दूर पुल से गिरकर मरता है
और मीडिया कहता है — “खबर नहीं है”।
तुमसे, जो अब भी सवाल करते हो —
कि ये दुनिया ऐसी क्यों है?
कि ये सिस्टम ऐसा क्यों है?
कि ये “इंसान” — मशीन क्यों बना दिया गया है?
सुनो, नौजवान साथियो!
यह समय बहसों में ‘दृष्टिकोण’ निहारने का नहीं,
यह समय है — दृष्टिकोण गढ़ने का।
यह समय है — धारा के विरुद्ध चलने का,
और धारा को मोड़ देने का भी।
पूँजी की हवेली में
तुम्हारी साँसें गिरवी हैं,
तुम्हारे सपनों पर चाकी चल रही है —
तुम फिर भी कहते हो — “व्यवहारिक बनो!”
व्यवहारिक कौन है?
जो गुलामी को ‘सुरक्षा’ कहता है?
या वो,
जो चट्टानों से बंधकर भी
आग चुराने को निकला था —
प्रोमेथियस की तरह?
*मार्क्स को पढ़ो*,
क्योंकि वो बताता है —
कि भूख एक अकेली बला नहीं है,
वो बताता है —
कि व्यवस्था बदल सकती है,
अगर बदलने वाले हों तो!
*लेनिन को पढ़ो*,
जो कहता है कि इतिहास
सिर्फ़ दस्तावेज़ों में नहीं,
क्रांतिकारी संगठन में पलता है।
*माओ को पढ़ो*,
जो बताता है —
“विद्रोह जायज़ है!”
और “जनता से सीखो!”
*स्तालिन को पढ़ो*,
ना कि अफवाहों से डर कर,
बल्कि इतिहास के पन्नों से —
जो ख़ून से नहीं, साहस से लिखे गए।
और फिर देखो —
क्या तुम्हारा दिल काँपता है
या गरजता है?
यह समय है, साथियो —
ईमानदार सोच के साथ,
तपते सवालों के साथ,
सड़कों पर उतरने का
फेसबुक लाइक्स नहीं —
फैक्ट्री गेट्स पर
इंकलाब की चिंगारी बोने का।
हमें चाहिए — नई पीढ़ी की बोल्शेविक नस्ल
जो मार्क्सवाद को नारे नहीं,
जीवनदर्शन समझे
जो इतिहास को बीता हुआ नहीं,
आने वाले समय की चीख समझे।
तो बोलो साथियो —
क्या तुम डरपोक खरगोश बनोगे,
या तूफान की तरह फट पड़ोगे?
क्या तुम प्रोमेथियस बनोगे —
जिसने देवताओं को ललकारा?
या बनोगे —
नौकरी की तलाश में ‘सॉफ्ट-स्किल्स’ में लिपटा
एक सुरक्षित गुलाम?
अगर हाँ —
तो आओ, बात करें।
आठ-दस दिन, किताबें, चाय और जनपक्ष —
और फिर कोई नया अक्टूबर,
कोई नया इतिहास
हमारे हाथों से निकलेगा —
यह सपना नहीं —
संघर्ष की भूमिका है।
बाक़ी सब लोग —
जो “इतिहास के अंत” पर यक़ीन करते हैं,
जो “आँगन की मुर्गियाँ” हैं,
जो चुपचाप इस व्यवस्था में
अपना हिस्सा खोज रहे हैं —
वो माफ़ करें,
यह कविता उनके लिए नहीं है।
(नोट- कविता कृष्णपल्लवी के पोस्ट से प्रेरित)____एम के आज़ाद..!!
