- _______ भारत को सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बनाने के नाम पर लड़े गये चुनाव के बाद आम जनता का नहीं भाग्य. ..!!
______ गरीबी बेरोज़गारी भुखमरी मंहगाई भ्रष्टाचार जैसी समस्याएं नहीं हुई हल …!!
______ आर्थिक विकास का दावा हुआ खोखला शासित, सामाजिक असमानता और धार्मिक नफरत से आम आदमी परेशान. ..!!
नई दिल्ली …!!
1992 के बाद से भारत में हुए तमाम चुनाव आर्थिक विकास के मुद्दों पर लड़े गये। यह सिलसिला 2014 तक जारी रहा। याद दिलाना बहुत जरूरी है कि नरेंद्र मोदी ने 2014 में सिंदूर और चूड़ी बांटकर चुनाव नहीं जीता थे बल्कि उनका दावा ये था कि भारत के आर्थिक विकास को वो नई बुलंदी पर पहुंचा देंगे।
कोई चाहे तो 2014 का पूरा कैंपेन निकालकर देख ले।
आज जो राजनीतिक भाषा बोली जा रही है, वहां दूर-दूर तक उसका कोई नामो-निशान नहीं था।
नया-नया आया सोशल मीडिया बकायदा ये प्रचारित करता था कि गुजरात के विकास पुरुष नरेंद्र मोदी रविवार की सुबह वक्त निकालकर आईआईटी की तैयारी कर रहे बच्चों को गणित पढ़ाते हैं।
खुद को एक प्रगतिशील और आर्थिक मुद्दों की गहरी समझ रखने वाले व्यक्ति के रूप में प्रचारित करके मोदी ने सत्ता हथियाई। यह शब्द इसलिए इस्तेमाल कर रहा हूं कि मोदी ने उन क्षमताओं का प्रचार करके चुनाव जीता जो असल में उनमें कभी थी ही नहीं। टोटली फेंक न्यूज़ फैलाया है चुनाव जितने के लिए।
आज मोदी जिस तरह वोट मांगते हैं, 2014 में उसी तरह मांगते तो 50 सीटें भी नहीं मिलतीं।
विकास पुरुष बनकर भारतीय समाज को नफरत और सांप्रदायिकता के अंधे कुएं में धकेलने से बड़ा नैतिक अपराध कुछ और हो सकता है?
नोटबंदी के तमाशे के बाद मोदी ने यह समझ लिया था कि उन्हें सिर्फ बातें करना आता है, उसके अलावा कुछ और उनके बस का नहीं है।
देश उसके बाद से फालतू बकवास में उलझा हुआ है। 1992 से लेकर 2014 इस देश के आर्थिक विकास की दर हाई सिंगल डिजिट में रही है। इसने रोजगार के असीमित अवसर पैदा किये, नतीजे में एक विशाल मध्यमवर्ग बना, जिसकी तोंद पर चर्बी चढ़ी है और आंखों पर पर्दा पड़ा है।
उसे लगता है कि अब जो तरक्की होती रही है, वह उसका हक है जबकि यह सच नहीं है। मिडिल क्लास यह देखने और समझने में पूरी तरह असमर्थ है कि बाकी दुनिया में क्या हो रहा है और उसके मुकाबले हम आज कहां खड़े हैं। आर्थिक विकास और वैज्ञानिक प्रगति दूर-दूर तक एजेंडे में है ही नहीं।
दुनिया में एक भी उदाहरण ऐसा नहीं है कि पूरा समाज नकारात्मकता में डूबा रहे, परपीड़न का सुख लूटता रहे और देश विकासशील का टैग हटाकर विकसित बन जाये। बड़े सपने बाकी दुनिया के लिए हैं। हम कादर खान के डायल़ॉग और सिंदूर खेला से अपना काम चला लेंगे।
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