_______ इटावा बकेबर के गांव दांदरपुर की घटना के बाद कहीं खुशी कहीं गम कौन कह सकता है श्रीमद भागवत कथा चर्चा हुई तेज…!!
______ शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा कि सिर्फ़ ब्राह्मण ही कह सकता है श्रीमद भागवत की कथा …!!!
______ विद्वान सर्वत्र पूज्यते कहने वालों को अपना धंधा खतरे में पड़ता दिख रहा है…!!
______’ विद्वान व्यक्ति की पहचान उसकी जाति से नहीं उसकी विद्युता से होना चाहिए यह सूत्र भी ब्राह्मणों पर होता हैं लागू…!!
राकेश रागी / नई दिल्ली. .!!
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा कि श्रीमद भागवत की कथा सिर्फ़ ब्राह्मण ही कह सकता है ? क्यों राजा अपने राज्य में पूजा जाता है विद्वान सर्वत्र पूज्यते कहने वालों को अपना धंधा खतरे में पड़ता दिख रहा है! विद्वान व्यक्ति की पहचान उसकी जाति से नहीं उसकी विद्वान होने से होनी चाहिये यह सूत्र भी केवल ब्राह्मणों पर ही लागू होता है ! कोई दलित पिछड़ा आदिवासी अगर विद्वान है तो उसकी पहचान उसकी विद्वान होने से नहीं होगी उसकी जाति से की जाएगी इसी वर्चस्ववादी सोच को मनुवाद कहते है।
इटावा जनपद के थाना बकेबर के गांव दांदरपुर में यादव कथावाचक का जातिगत आधार पर सिर मुंडवाने और फिर एक ब्राह्मण महिला के मूत्र से उसका शुद्धीकरण किए जाने की घटना सामने आने के बाद मनुवाद पर सवाल उठना लजमी है। एक तरफ दलित पिछड़े की आंखों से धर्म के धंधे का जाला उतरने लगा है। वही वर्चस्ववादी मनुस्मृति पर आधारित समाज में यथास्थिति बनाए रखने वालों को अपना धंधा हाथ से फिसलता दिखाई दे रहा है।
इटावा की घटना के बाद दलितों पिछड़ों को अपने पैर की जूती समझने वालों को करारा झटका लगा है। ऐसा लग रहा है कि वर्चस्ववादी उर्द के धोखे में काली मिर्च चवा गये हैं। दांदरपुर गांव और उसके आसपास के ब्राह्मण वर्चस्ववादियों को इस घटना के बाद इस बात का अहसास हो गया है कि डर और भय के माहौल में कैसे जिया जाता है या फिर डर और भय के माहौल में लोग कैसे जीते हैं. .!!
इटावा की घटना के बाद भागवत कथाएं धड़ाधड़ रद्द हो रही हैं, ब्राह्मणों की पुरोहिती के सूचकांक में गिरावट दर्ज की जा रही है!
ब्राह्मणों के चेहरों पर डर का भाव देखा जा रहा है यह सब तब है जब शासन प्रशासन मनुवादियों के साथ खड़ा है..!!
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के ब्राह्मणवादी बयान को ध्यान में रखकर दलित पिछड़े आदिवासी कथावाचकों को श्रीमद भागवत कथा नहीं कहनी चाहिए उन्हें श्रीकृष्ण कथा. अर्जुन कथा. बाल्मिकी कथा.बाबा साहब भीम राव अंबेडकर कथा. सरदार भगत सिंह आदि महापुरुषों की कथाएं ब्राह्मणवाद की अर्थी पर बैठकर कहनी चाहिए ताकि वर्चस्ववादी मनुवाद का समाज से प्रभाव समाप्त हो सके !!
जो भी है मनुष्य जाति से नहीं कर्म से श्रेष्ठ होता है सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने यादवों को भगवान कृष्ण का वंशज मानते हुए पूज्य बताया है यह मनुवादी यादवों के साथ ऐसा कुकृत्य कर सकते हैं तो इनकी अन्य पिछड़ों दलितों आदिवासियों के प्रति क्या सोच होगी .!!
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से एक सवाल पूंछा रहा हूं जो ब्राह्मणवादी यादवों से नफरत करते हैं वह दलितों अन्य पिछड़ी जातियों के लोगों के हाथ का पानी नहीं पीते वह उनके यहां कथा कहने जाएंगे? कब तक जाति धर्म के नाम यह अन्याय होता रहेगा कब तक यह जातिगत आधार पर मनुवाद जिंदा रहेगा क्या मनुवाद को जिंदा रखने के लिए ही संविधान से धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद शब्द हटाने की तैयारी चल रही हैं।
इटावा की घटना के बाद सारा समाज दो खैमों में बटा दिखाई दे रहा है एक पीड़ित के साथ एक प्रतिवादी के साथ परन्तु दोनों में से एक तो धर्म रक्षक है दूसरा जिसका शोषण हुआ हैं वह भी धर्म को धंधा कहने से डर रहा है काल मार्क्स ने सही लिखा हैं धर्म अफीम का नशा है जो सिर मुंडवाने मूत्र से पवित्र किए जाने के बाद भी नहीं उतर रहा है इसे धर्म के प्रति अंधा अनुकरण कहा जाए या फिर डर कहेंगे ??
फिलहाल मैं बस इतना कहूंगा जाति के नाम पर जहर उगलने वालों से सावधान रहने की जरूरत है वर्चस्ववादी अपना सामाजिक वर्चस्व कायम करने के लिए समाज में तोड़फोड़ करने की कोशिश करते रहे हैं करते रहेंगे उनकी इन कोशिशों को बेनकाब करने के लिए वर्गीय आधार पर संगठित होकर संघर्ष करने के लिए तैयार रहना होगा तभी हम सामाजिक एकता के ताने बाने के बचा कर रख पाएंगे. .!!!
