_______महान शहीद, क्रांतिवीर, चंद्रशेखर आज़ाद अमर रहें आजाद की शहादत को क्रान्तिकारी सलाम. ..!!!
______ असली आज़ादी के लिए मेहनतक़शों की एकता क़ायम कर, आगे बढ़ो…!!!
नई दिल्ली. ..!!!
अलिराज़पुर रियासत मध्य प्रदेश के गांव भाभरा में, एक निर्धन ब्राह्मण दंपत्ति, सीताराम तिवारी तथा जगरानी देवी के घर, 23 जुलाई, 1906 को चंद्रशेखर तिवारी का जन्म हुआ, जिन्होंने अपना जीवन, औपनिवेशिक लुटेरे शासक, अंग्रेज़ों से आज़ादी मात्र के लिए ही नहीं, बल्कि मेहनतक़श अवाम की असली आज़ादी के लिए न्यौछावर कर दिया, और क्रांतिवीर अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद के नाम से, हर देशवासी के दिल में जगह बनाई. अंग्रेज़ों की सारी पुलिस-फौज और ख़ुफ़िया एजेंसियां, उन्हें जीवन भर गिरफ्तार नहीं कर पाई. 27 फ़रवरी 1931 को, इलाहाबाद के एल्फ्रेड पार्क में क्रांतिवीर चंदशेखर आज़ाद ने शहादत पाई थी…!!
मात्र 15 साल की उम्र के इस बालक ने, गांधीजी के असहयोग आन्दोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. ‘चौरी-चौरा’ कांड के बाद, गांधीजी द्वारा, अचानक आन्दोलन वापस लेने के निर्णय से झल्लाए, चंद्रशेखर आज़ाद, आज़ादी आन्दोलन की क्रांतिकारी धारा की ओर मुड़ गए और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्हें 1928 में ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA)’ का कमांडर-इन-चीफ चुना गया. काशी विद्यापीठ में पढ़ते हुए ही असहयोग आंदोलन में कूद जाने की वज़ह से उनकी शिक्षा बहुत कम हुई थी. ‘कमांडर-इन-चीफ बना दिया, अब मुझे पढाओ भी तो सही’, उनके इस आग्रह के बाद, संगठन के वरिष्ठ साथी, शिव वर्मा ने उन्हें ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ की एक-एक लाइन समझाई थी. साथ ही, जब भी उन्हें वक़्त मिलता था, वे, साथी सत्यभक्त से, बुखारिन द्वारा लिखी, ‘ए बी सी ऑफ़ कम्युनिज्म’ का हिंदी अनुवाद पढ़ते थे….!!!
साथियों, क्रांतिकारी राजनीति के लिए भी पैसा चाहिए होता है. जागरुक और ज़िम्मेदार नागरिकों का फ़र्ज़ होता है कि वे, अपनी सामर्थ्य के अनुसार क्रांतिकारियों की आर्थिक मदद करें. असली आज़ादी लाने के लिए, जीवन क़ुर्बान कर देने वाले, अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की पार्टी, एचएसआरए को, जब देशवासियों से अपेक्षित आर्थिक मदद नहीं मिली, तब उन्होंने, गुलाम बनाकर लूटने वाले अंग्रेज़ों को लूटने की योजना बनाई. 9 अगस्त, 1925 को, सरकारी ख़जाना ले जा रही, सहारनपुर-लखनऊ, सवारी गाड़ी को, लखनऊ के पास काकोरी स्टेशन पर लूटा गया. ‘काकोरी कांड’ नाम से मशहूर हुई, यह क्रांतिकारी वारदात, चंद्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व में ही हुई, जिसमें उनके कुल 40 साथी गिरफ्तार हुए, जिन्हें कठोर सज़ाएं हुईं, 4 वरिष्ठ कॉमरेडों, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्लाह खां, राजेन्द्र लाहिड़ी तथा रोशन सिंह को फांसी हुई. अंग्रेज़ों की बौखलाई पुलिस और ख़ुफ़िया दस्ते, एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाकर भी, ‘आज़ाद’ को गिरफ्तार नहीं कर पाए….!!!!
संगठन के साथियों को अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करने वाले, क्रांतिवीर चंद्रशेखर आज़ाद, आर्थिक कठिनाईयों की वज़ह से, काकोरी कांड में गिरफ्तार क्रांतिकारियों के मुक़दमे भी ठीक से नहीं लड़ पा रहे थे, और मुख्य आरोपी होने के कारण, उन्हें ख़ुद भी, भेष बदल-बदल कर, मुसीबतें झेलते हुए छुपकर रहना पड़ रहा था. इसलिए उन्होंने, अपनी पार्टी, एचएसआरए के साथी यशपाल को, आर्थिक मदद के लिए, हिंदू महासभा के धनी नेता और हिंदुत्ववादियों के गुरु, सावरकर के पास, पूना भेजा. यशपाल ने, अपनी जीवनी ‘सिंहावलोकन’ के पृष्ठ 72 पर लिखा है कि सावरकर ने यशपाल से कहा, ‘मैं आपको र 50 रुपये के साथ, एक पिस्तौल भी दान दे दूंगा, लेकिन एक शर्त है; ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध नहीं, बल्कि मुस्लिम लीग के विरुद्ध लड़ो और ज़िन्ना तथा दो अन्य का क़त्ल करना होगा’ यशपाल को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ, और सावरकर के ‘तोहफ़े’ को वहीं ठुकराकर, ग्वालियर के हॉस्टल में आ गए, जहां चंद्रशेखर आज़ाद छुपे हुए थे…!!!
यशपाल के अनुसार, पूरी बात सुनकर, चंद्रशेखर आज़ाद आग बबूला हो गए और चीखकर बोले, “वह हरामज़ादा, हमें, क्रांतिकारी नहीं, भाड़े का क़ातिल समझता है देश के मेहनतक़शों को अंग्रेज़ों की गुलामी की ज़िल्लत से आज़ाद, खुशहाल और सम्मान की जिंदगी का ख़्वाब अपने दिल में संजोए, देश के असली भारत रत्न, चंद्रशेखर आज़ाद, भेष बदल-बदल कर, पुलिस को चकमा देते रहे, अपने साथियों के लिए लड़ते रहे,, बेइंतेहा मुसीबतें झेलते रहे, लेकिन मेहनतक़शों की असली आज़ादी के प्रति उनकी दीवानगी कम नहीं हुई…!!!
अंग्रेज़ सरकार, भारत पर गुलामी का अपना ख़ूनी पंजा मज़बूत करने और मज़दूरों के अधिकारों पर हमला बोलने के लिए, ‘ट्रेड डिस्प्यूट बिल’ तथा लोगों को, विरोध करने, संगठित होकर लड़ने से रोकने के लिए, ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ नाम के दो काले क़ानून ला रही थी, जिनका विरोध करने के लिए, शहीद-ए-आज़म भगतसिंह तथा महान स्वतंत्रता सेनानी बटुकेश्वर दत्त ने, 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली सेंट्रल असेंबली में बम फोड़े थे; ‘बहरों को सुनाने के लिए धमाके की ज़रूरत होती है’. ‘इंक़लाब जिंदाबाद’, ‘साम्राज्यवाद का नाश हो’ नारे लगाते हुए, उन्होंने असेंबली में जो पर्चे फेंके थे, उन पर, ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के कमांडर-इन-चीफ की हैसियत से, गुप्त नाम ‘बलराज’ से उनके ही दस्तख़त थे..!!!
23 मार्च 1931 को भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी होनी थी. अपने सभी सदस्यों से बेइंतेहा प्यार करने वाले, चंद्रशेखर आज़ाद, अपने इन अहम कामरेडों को जेल से छुड़ाने के लिए तड़प रहे थे. उसी की तैयारियों के लिए, वे, 27 फ़रवरी, 1931 को, इलाहबाद के एल्फ्रेड पार्क, मौजूदा नाम, चंद्रशेखर आज़ाद पार्क में मौजूद थे. उनकी ही पार्टी के सदस्य, वीरभद्र तिवारी ने गद्दारी की, और अंग्रेज़ पुलिस को बता दिया कि पार्क में चंद्रशेखर आज़ाद अकेले मौजूद हैं. भारी तादाद में, हथियारबंद पुलिस ने, पार्क को चारों ओर से घेर लिया. दोनों ओर से गोलियां दनदनाने लगीं. देश के इस लाड़ले सपूत की पिस्तौल में जब एक गोली बची, तो उन्होंने, पिस्तौल अपनी कनपटी पर रखकर ट्रिगर दबा दिया. इस तरह, क्रांतिकारी वीर, चंद्रशेखर आज़ाद, रणभूमि में अंग्रेज़ों से लड़ते हुए शहीद हुए…!!
क्रांतिवीर चंद्रशेखर आज़ाद की शहादत के बाद, अंग्रेज़ों की पुलिस ने, जल्दी से, इलाहबाद के रसूलाबाद घाट पर चोरी-चोरी उनका अंतिम संस्कार कर दिया, लेकिन लोगों को फिर भी पता लग गया. सारा इलाहबाद ही नहीं, बल्कि आस-पास गावों के भी लाखों लोग उमड़ पड़े, जिन्हें नियंत्रित करने के लिए फ़ौज बुलानी पड़ी थी. ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के मरहूम कमांडर-इन-चीफ, चंद्रशेखर आज़ाद का अस्थि कलश, शचीन्द्रनाथ शान्याल की पत्नी, प्रतिभा शान्याल को सौंपा गया, क्योंकि वे भी संगठन की सदस्य थीं. लाखों लोग अंतिम यात्रा में शरीक़ हुए और भावुक हुईं प्रतिभा शान्याल ने बहुत क्रांतिकारी और मर्मस्पर्शी भाषण दिया…!!
हमारी सामाजिक सड़न का एक दर्दनाक वाक़या छुपाना ठीक नहीं. क्रांतिवीर चंद्रशेखर आजाद की शहादत के कुछ ही दिन बाद, उनके पिताजी सीताराम तिवारी भी चल बसे. जवान बेटे की मौत से टूट चुकीं और भयानक ग़रीबी झेल रहीं, अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की माँ, श्रद्धेय जगरानी देवी को, निष्ठुर लोग, ‘हत्यारे की माँ, भगोड़े की मां’ कहकर चिढ़ाते थे, ताने मारते थे. ‘आज़ाद’ को अपना गुरु मानने वाले, झाँसी निवासी, संगठन के उनके कॉमरेड सदाशिव को जब इस बात का पता चला, तो वे तुरंत उन्हें अपने घर ले आए. तब से मार्च 1951 में अपनी मृत्यु तक, श्रद्धेय जगरानी देवी की ही भाषा में, उनके छोटे बेटे सदाशिव के घर पर ही रहीं. इतना ही नहीं, झाँसी के साथियों ने, उनकी याद में झांसी में, ‘श्रद्धेय माँ जगरानी देवी’ नाम से एक स्मारक भी बनवाया…!!!
___अमर शहीदों का ख़्वाब अधूरा—हम सब मिलकर करेंगे पूरा.!!
क्रांतिवीर, अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद, शहीद-ए-आज़म भगतसिंह और उनके सैकड़ों साथी क्रांतिकारी शहीदों ने, क्या इसी आज़ादी के लिए अपनी जिंदगी क़ुर्बान कीं, जिसमें आज हम जी रहे हैं? देश का 90% मेहनतक़श अवाम, क्या आज, सचमुच आज़ाद और खुशहाल है? क्या आर्थिक आज़ादी के बगैर, मिली राजनीतिक आज़ादी, सही माने में आज़ादी कही जा सकती है? साफ़ नज़र आता है, साथियों, आज़ादी के नाम पर हम मेहनतक़शों के साथ धोखा हुआ है. देश के धन्नासेठों, लुटेरे पूंजीपतियों, अडानी-अंबानी, टाटा-बिड़ला ने आज़ादी को हड़प लिया है, और अंग्रेज़ों की जगह, अब, वे हमें लूट रहे हैं। हम सबको मजदूर किसानों छात्रा नौजवानों के बीच एकता कायम कर आर्थिक बराबरी की मुहिम तेज करनी होगी…!!!
