__ कविता -: पश्चाताप…..!!
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पश्चाताप स्मृति रंध्रों से
पीड़ा का रिसाव है
पश्चाताप हमारी समझ और विवेक का
अधूरापन है
और हमारे बेहतर मनुष्य होते जाने का
प्रमाण भी….!!
पश्चाताप हमारी वस्तुपरकता को
ठण्डी निर्ममता से बचाता है
और सारी गतिविधियों के केन्द्र में
मनुष्य को रखना सिखाता है…!!
पश्चाताप इतिहास का
संवेदनामूलक समाहार है
और संवेदना का इतिहास लिखने की
सबसे अच्छी भाषा है…!!
हम बार-बार पीछे मुड़कर देखते हैं
और जीवित रहने के लिए
पश्चाताप करने लायक
कुछ न कुछ ढूँढ लाते हैं…!!
पश्चाताप प्रेरणा की विकल आत्मा है…!
पश्चाताप यदि देवता के सामने
पाप स्वीकृति या क्षमायाचना बन जाये
तो हम कमज़ोर, स्वार्थी और
घुटे हुए पापी बन जाते हैं
पश्चाताप आत्मकथा का विवेक
और कविता की प्राणवायु है…!!
पश्चाताप हमें तानाशाह बनने
और तानाशाह का हुक्म बजाने से बचाता है…!!!
✍️ कात्यायनी
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