_____ शहीद-ए-आज़म भगतसिंह का जन्म दिन पर मनाया गया ‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा’ का तीसरा स्थापना दिवस …!!
____ भगत सिंह तेरे ख्वाब अधूरे हम सब मिलकर करेंगे पूरे नारा किया गया बुलंद. ..!!
_____ क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा में मजदूरों के बीच एकता कायम करने पर दिया बल …!!
____ ‘हवाओं में रहेगी मेरे ख़याल की बिजली, ये मुश्त-ए-खाक़ है फ़ानी; रहे, रहे, ना रहे’..!!
फरीदाबाद / हरियाणा ..!!
रविवार, 28 सितंबर 2025, सुबह 11 से शाम 6 बजे तक, चंद्रिका प्रसाद स्मारक सामुदायिक भवन, आज़ाद नगर, सेक्टर 24, फ़रीदाबाद में 3 शानदार कार्यक्रम हुए. शहीद-ए-आज़म भगतसिंह के 118 वें जन्म दिन तथा क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा के तीसरे स्थापना दिवस को सामुदायिक भवन, लाल झंडों, अमर शहीद क्रांतिकारियों, जन साहित्यकारों के विचारों के बैनरों से सज़ा हुआ था..!!
कार्यक्रम को ख़ास और यादगार बनाने का श्रेय, निसंदेह, ‘निशांत नाट्य मंच’ की पूरी टीम को जाता है, जिनकी क्रांतिकारी गीतों की प्रस्तुति तथा गुरशरण सिंह जी के प्रख्यात नाटक, ‘इंक़लाब जिंदाबाद’ के प्रभावशाली मंचन ने, ऐसा समां बांधा कि लोग भावविभोर हो उठे. हालांकि यह बात भी तवज्जो चाहती है कि कार्यक्रम को विफ़ल करने के कुटिल मक़सद से, संबंधित विभाग और डिपो वाले ने, आज़ाद नगर मज़दूर बस्ती में, राशन वितरण का कार्यक्रम, उसी दिन और ठीक उसी वक़्त रखा..!!
कार्यक्रम की शुरुआत शहीद-ए-आज़म भगतसिंह की मूर्ति पर माल्यार्पण और क्रांतिकारी गीतों, नारों से हुई. सामुदायिक भवन में जमा लोग, 11 बजे, जुलूस की शक्ल में नारे लगाते हुए, शहीद भगतसिंह चौक पहुंचे, जहाँ, ‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा’ ,ने अपने पहले सम्मेलन के मौक़े पर, शहीद-ए-आज़म की मूर्ति प्रस्थापित की थी. कॉमरेड नीलिमा शर्मा, कॉमरेड प्रो शमशुल इस्लाम, लालबहादुर सिंह, ओमबीर सिंह, मारिया, अनुराग तथा अबीर द्वारा गाए गीतों से, उपस्थित जन समुदाय पूरी तरह एकाकार हो गया था. उसके बाद कार्यक्रम स्थल पर भी क्रांतिकारी गीत गए गए और ‘इंक़लाब जिंदाबाद’ नाटक का बहुत प्रभावशाली मंचन हुआ. स्वाती तथा स्नेह ने भी गीत गए…!!
साथियों, जो लोग कहते हैं; ‘इस देश में कुछ नहीं हो सकता, जाति-धर्म के पचड़ों में पड़े लोग क्रांति नहीं करते’, उन्होंने, शहीद-ए-आज़म भगतसिंह को नहीं पढ़ा है. ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन’ के महान शहीद, इसी मिट्टी से पैदा हुए थे. भगत सिंह का जन्म, गांव बंगा, ज़िला लायलपुर (फ़ैसलाबाद, पाकिस्तान) के किसान परिवार, किशन सिंह एवं विद्यावती के घर, 28 सितंबर को हुआ था. गंभीर रूप से पढ़ाकू और संवेदनशील, भगतसिंह, लाहौर के नेशनल कॉलेज में पढ़ते हुए, आज़ादी आंदोलन में कूद पड़े, और एक खूबसूरत फूल की तरह हर रोज़ खिलते-महकते गए. ‘मेहनतक़श अवाम की मुक्ति, समाजवादी क्रांति से ही मुमकिन है’ समझकर, एक परिपक्व मार्क्सवादी- लेनिनवादी विचारक बने. साम्राज्यवादी लुटेरों ने अगर ये फूल, महज़ 23 साल की उम्र में, ना मसला होता, तो देश का क्रांतिकारी इतिहास कुछ और ही होता…!!
‘प्रताप’, ‘महारथी’, ‘चाँद’, ‘अर्जुन’, ‘मतवाला’ तथा ‘किरती’ पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से, हिंदी, अंग्रेज़ी, पंजाबी और उर्दू भाषा में लिखे उनके लेख, समाज को नई राह दिखाने वाले हैं. गुलामी की ज़िल्लत के विरुद्ध, बग़ावत का ऐलान करते हुए, 17 दिसंबर, 1927 को, ज़ालिम अंग्रेज़ पुलिस अधिकारी सौन्ड़र्स की हत्या, ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ में मात्र ‘समाजवादी’ शब्द ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक समाजवादी विचार प्रस्तुत करना, दमनकारी क़ानूनों, ‘प्रेस देशद्रोह क़ानून, 1922’, ‘औद्योगिक विवाद विधेयक, 1929’ तथा ‘सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक, 1929’ का तीखा विरोध करने के लिए दिल्ली असेंबली में बम धमाके, ‘बहरों को सुनाने के लिए धमाकों की ज़रूरत होती है’ आदि घटनाओं में सक्रिय भूमिका निभाते हुए, जेल में रहते हुए, 2 फरवरी, 1931 को लिखा, ‘क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा’ उनके चिंतन का शिखर ऐतिहासिक दस्तावेज़ है….!!
आज किसी को भी संदेह नहीं कि 1947 में मिली आज़ादी झूठी है. गोरे अंग्रेज़ों की जगह, भूरे अंग्रेज़, उनसे भी बुरी तरह, मज़दूरों, मेहनतक़शों को निचोड़ रहे हैं. धन्ना सेठ कॉर्पोरेट की निर्लज्ज ताबेदारी कर रहे हैं. अभूतपूर्व बेरोज़गारी, मंहगाई से कराहते अवाम की विरोध की आवाज़ कुचलने के लिए, हर रोज़ काले क़ानून बना रहे हैं, संविधान की धज्जियां उड़ा रहे हैं. समाज को हिंदू-मुस्लिम में बांटने की ‘कला’ में, ये, अंग्रेज़ों के भी बाप हैं!! गोरी चमड़ी वाले अंग्रेज़ों को पहचानना आसान था, भूरे अंग्रेज़, चूंकि हमारे जैसे ही दिखते हैं, इसलिए समाज का एक हिस्सा, उनके झांसों, पाखंडों, झूठी लफ्फाजी से गुमराह होकर, उनका असली चरित्र ना पहचान कर, अंधराष्ट्रवादी और उन्मादी नशे में झूम रहा है, उनकी फ़ासीवादी परियोजना का औज़ार बना हुआ है. सारे मेहनतक़शों को जगाना, उन्हें गोलबंद करना ही, आज, भगतसिंह का सच्चा वारिश होना है. ..!!!
‘माना कि इस ज़मीं को ना गुलज़ार कर सके; कुछ ख़ार तो कम कर गए, गुजरे जिधर से हम’ – साहिर..!!
इस अवसर पर अध्यक्ष मंडल के साथी राकेश रागी .रणवीर सिंह. राजेंद्र सिंह राकेश सिंह भदौरिया ने अध्यक्षीय संशोधन दिया साथ ही कामरेड विमल त्रिवेदी. उमाकांत. दिनेश यादव पराग आदि ने विचार व्यक्त किये.संचालन कार्यक्रम के संयोजक सत्यवीर ने किया संगठन के अध्यक्ष नरेश ने आभार व्यक्त किया ..!!
