__अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे के दौर में कबीर की प्रासंगिकता बढ़ जाती है :- सुभाष चंद्र कुशवाहा
____ कबीर ने अपने समय में सांप्रदायिक कट्टरता का सामना अभिव्यक्ति की आजादी के इस्तेमाल से किया…!!
____ कबीर ने ज्ञान का विकेंद्रीकरण किया और श्रम और ज्ञान में एक रिश्ता कायम किया, जिससे उस समय के शूद्रों को वंचित रखा गया था…!!
लखनऊ / उत्तर प्रदेश. ..!!
आज दिनांक 11 जनवरी, 2026 को स्वराज विद्यापीठ, याराने लालबहादुर और जन संस्कृति मंच के संयुक्त तत्वावधान में लाल बहादुर वर्मा स्मृति आयोजन विद्यापीठ सभागार में किया गया…!!
इस अवसर पर आयोजित व्याख्यान में प्रसिद्ध साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी सुभाष चंद्र कुशवाहा ने ‘वर्तमान समय में कबीर की प्रासंगिकता विषय’ पर बोलते हुए कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे के दौर में कबीर की प्रासंगिकता बढ़ती जा रही है….!!
कबीर ने अपने समय में सांप्रदायिक कट्टरता का सामना अभिव्यक्ति की आजादी के इस्तेमाल से किया। उन्होंने यह बताया कि कबीर पर अद्वैतवाद का उतना प्रभाव नहीं था जितना कि सूफियों का था, और जोगियों की परंपरा सूफ़ी परंपरा से उद्भूत हुई है…!!
उन्होंने वर्तमान दौर में हो रहे श्रम पर हमले के सामने कबीर को प्रासंगिक पाया क्योंकि कबीर श्रम की गरिमा को स्थापित करने वाली शख्सियत थे। उनके अनुसार कबीर मार्क्स के पूर्ववर्ती थी, उन्होंने ज्ञान का विकेंद्रीकरण किया और श्रम और ज्ञान में एक रिश्ता कायम किया, जिससे उस समय के शूद्रों को वंचित रखा गया था…!! सुभाष चंद्र कुशवाहा ने प्रो. लाल बहादुर वर्मा के साथ गोरखपुर विश्वविद्यालय में अपने विद्यार्थी जीवन में बिताए अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि प्रो. वर्मा विद्यार्थियों को विश्वदृष्टि दिखाने वाले शिक्षक थे, वे विषय के साथ सामाजिक सरोकार का दायित्वबोध भी सिखाते थे…!!
कार्यक्रम के पहले हिस्से में प्रो. लाल बहादुर वर्मा से जुड़े संस्मरणों को साझा करते हुए उनसे हमेशा प्रेरित होने वाली नारीवादी विचारक और संस्कृतिकर्मी पद्मा सिंह ने कहा कि प्रो वर्मा. से संवाद करके कोई विद्यार्थी उनका हो जाता था, वह हर इंसान के जीवन कोई एक नई राह दे देते थे, घर के भीतर से बाहर तक उनका सरोकार विद्यार्थी केंद्रित और इतिहास से प्रेरणा लेने वाला होता था..!!
प्रो. वर्मा से विद्यार्थी जीवन से जुड़े हुए दर्शनशास्त्र के शिक्षक डॉ. अतुल कुमार मिश्र ने कहा कि लाल बहादुर वर्मा का साथ उनकी ज़िंदगी में जीने के मयार को समझाने वाला था, वे ऐसे शिक्षक थे जो असहमतियों के बीच में संवाद रखना जानते थे, उन्होंने इतिहास को न सिर्फ पढ़ाया बल्कि इतिहास की रचना भी की। कार्यक्रम में प्रो. वर्मा के करीबी रहे कवि अंशु मालवीय ने युवा कवि सौम्य मालवीय द्वारा लिखी कविता ‘लाल बहादुर वर्मा’ का पाठ किया….!!
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए इतिहासकार और जनबुद्धिजीवी प्रो. हेरंब चतुर्वेदी ने प्रो. वर्मा के साथ मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास विभाग के शिक्षक कक्ष में बिताए हुए उन पलों को याद किया जब वर्मा जी सहकर्मी शिक्षकों के साथ संवाद को बनाए रखते थे। शिक्षक हों या विद्यार्थी सभी उनसे मिलकर खुद को ढूँढने की ख्वाहिश करते थे…!!
प्रो. हेरंब चतुर्वेदी ने कहा कि कबीर भारतीय जमीन पर पुनर्जागरण के प्रतीक पुरुष थे। उन्होंने अपने समय को वह दिशा दी जो उस वक्त की जरूरत थी, कबीर ने वर्ण व्यवस्था से लेकर धार्मिक आडंबरों का प्रतिकार किया था, वे बुनकर होने के साथ मन के जोगी भी थे। कबीर के विचारों की प्रासंगिकता आज के दौर में बढ़ती जा रही है…!!
कार्यक्रम के अंत में प्रसिद्ध कहानीकार और पहल के संपादक ज्ञानरंजन जी, लोहिया विचार मंच के संस्थापक और समाजवादी विचारक विनय कुमार सिन्हा, पर्यावरणविद माधव गाडगिल और कवि विनोद कुमार शुक्ल के पिछले दिनों हुए निधन पर दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि भी दी गई…!!
इस अवसर पर स्वराज विद्यापीठ के कुलगुरु प्रो. आर. सी. त्रिपाठी, सुमन शर्मा, प्रो. कृष्ण स्वरूप आनंदी, श्रीप्रकाश मिश्र, जफ़र बख्त, गायत्री गांगुली, प्रो. अनीता गोपेश, अजित जायसवाल, प्रो. बसंत त्रिपाठी, प्रेमशंकर, प्रतिमा रानी, डॉ. रफाक अहमद, डॉ. अमरजीत राम, के. के. रॉय, रमेश कुमार, राकेश गुप्ता, औरंगजेब, आलोक अनिकेत, शिवम पांडे, सुनीता शाह, अमिता शीरीं, विश्व विजय, अविनाश मिश्रा समेत सैकड़ों विद्यार्थी और समाजकर्मी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन अंकित पाठक ने किया. ..!!
