___ _____मोदी सरकार ने सूचना के अधिकार अधिनियम को कियख कमजोर कर जनता के हाथ से जवाबदेही का सबसे बड़ा हथियार छीना ….!!
______ नए संशोधन के तहत, यदि कोई खोजी पत्रकार या आरटीआई कार्यकर्ता किसी सरकारी घोटाले या भ्रष्टाचार को उजागर करता हैं तो देना पड़ सकेगा पांच करोड़ तक जुर्माना
नई दिल्ली. …!!
मोदी सरकार ने सूचना के अधिकार आरटीआई अधिनियम को कमजोर कर जनता के हाथ से जवाबदेही का सबसे बड़ा हथियार छीन लिया है। अब सरकार और प्रशासनिक तंत्र में बैठे भ्रष्ट अधिकारी और नेता बिना किसी डर के मनमानी कर सकते हैं, क्योंकि आरटीआई के तहत जवाब मांगना अब आसान नहीं रहेगा।
नए संशोधन के तहत, यदि कोई खोजी पत्रकार या आरटीआई कार्यकर्ता किसी सरकारी घोटाले या भ्रष्टाचार को उजागर करता है, तो उस पर पांच सौ करोड़ तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। यह प्रावधान स्वतंत्र पत्रकारिता और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए एक सीधा खतरा है, क्योंकि अब कोई भी सरकारी धांधली को उजागर करने की हिम्मत नहीं करेगा। बैंक घोटालों, राशन कार्ड फ्रॉड और वोटर लिस्ट धांधली जैसी गड़बड़ियों की जानकारी अब सार्वजनिक नहीं की जा सकेगी, क्योंकि इसे “व्यक्तिगत डेटा” बताकर रोक दिया जाएगा।
संशोधन के जरिए सरकार को यह अधिकार दे दिया गया है कि वह किसी भी जानकारी को “व्यक्तिगत सूचना” मानकर छिपा सकती है। इसका मतलब यह हुआ कि बड़े उद्योगपतियों के कर्ज माफ किए जाने, चुनावी बॉन्ड घोटाले और सरकारी धन की बर्बादी जैसी जानकारियों को अब जनता से छिपाने का पूरा कानूनी रास्ता तैयार कर दिया गया है। सरकार जिसे चाहेगी, उसे डेटा प्रोटेक्शन एक्ट से छूट दे देगी, लेकिन बाकी सभी पर यह कानून सख्ती से लागू किया जाएगा। इसका सीधा असर यह होगा कि सरकारी नीतियों पर सवाल उठाने वाले और घोटालों को उजागर करने वाले नागरिकों और संगठनों को कानूनी दांव-पेंच में फंसाया जा सकेगा।
पहले आरटीआई के तहत सूचना न देने पर सूचना आयोग में अपील की जा सकती थी, लेकिन अब सरकार खुद तय करेगी कि कौन सी जानकारी “अवैध” है और कौन सी नहीं। इसका अर्थ यह हुआ कि आरटीआई कानून अब पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में होगा, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही खत्म हो जाएगी। जनता को सरकार से सवाल पूछने का अधिकार धीरे-धीरे समाप्त किया जा रहा है।आरटीआई अधिनियम, जिसने 2005 से लेकर अब तक लाखों भ्रष्टाचारियों को बेनकाब किया था, अब निष्क्रिय कर दिया गया है। मोदी सरकार ने लोकतंत्र के एक महत्वपूर्ण स्तंभ पर हमला कर दिया है, ताकि उसकी नाकामियों और भ्रष्टाचार की परतें कभी न खुलें। अब सवाल यह है कि क्या हम इस हमले को चुपचाप सह लेंगे या अपनी लोकतांत्रिक ताकत को बचाने के लिए आवाज उठाएंगे?
