________________मई दिवस….!!
यह कोई तारीख नहीं,
यह संघर्ष की चिनगारी है—
शिकागो की गलियों से उठी वह आग,
जिसमें जले थे
झूठे आरोपों के दस्तावेज,
और उगे थे फाँसी पर लटके
क्रांतिकारी नाम—
पार्सन्स, फिल्डन, स्क्वाब, एंगेल,
नीबे, लिङ और फिशर।
मई दिवस—
मतलब सिर्फ आठ घंटे की माँग नहीं,
बल्कि समय की वह लकीर है
जो कहती है:
“मेहनत की भी एक हद है,
आराम भी हक़ है,
और सपने देखने का वक्त भी चाहिए।”
१८८६ की वह क्रांति,
१८८९ की वह घोषणा,
और १८९० का वह पहला मई—
ये कोई अतीत नहीं,
बल्कि भविष्य का बीज है
जो हर बार
जब कोई मज़दूर थककर गिरता है,
फिर से उगता है।
दिन को तीन हिस्सों में बाँटते मजदूर
सिर्फ अपनी ज़िन्दगी नहीं सँवारते,
वे दुनिया की शक्ल बदलने का
ख़्वाब सँजोते हैं।
काम, विश्राम और जीवन—
तीनों का संतुलन माँगते हैं।
आज फिर से
वही शिकारी आँखें
हमारे अधिकारों को निगलने को तैयार हैं—
नए श्रम कोड में जकड़ने की कोशिश,
ठेका, गिग, आउटसोर्सिंग के नाम पर
हमसे हमारा वर्तमान छीना जा रहा है,
हमारे भविष्य को गिरवी रखा जा रहा है।
मजदूर साथियो!
आज का मई दिवस
हमें सिर्फ इतिहास नहीं बताता—
यह हमें चेतावनी देता है:
“अगर तुमने अपनी लड़ाई खुद नहीं लड़ी,
तो कोई और तुम्हारी ज़ंजीरें नहीं काटेगा।
मई दिवस—
पूँजी की दीवारों पर
घंटियों की चोट है,
जिसे सुनने से डरते हैं
वही जो श्रम से डरते हैं।
क्योंकि उन्हें पता है
कि एक दिन यह मेहनत
सिर्फ आठ घंटे नहीं मांगेगी,
बल्कि सत्ता भी माँगेगी—
श्रमिकों के हाथों में।
आज भी दुनिया में कहीं
इस दिन को कुचला जाता है,
कहीं इसे गैरकानूनी कहा जाता है,
पर जहाँ-जहाँ यह गीत गूंजता है,
वहाँ-वहाँ क्रांति का बीज
धरती में कुछ गहरा समा जाता है।
यह दिवस है—
याद का, आग की लौ का,
सत्ता की नींव हिला देने वाले
हाथों की एकजुटता का।
यह सवाल है
कि दुनिया मेहनतकशों की होगी
या पूँजी के पिट्ठुओं की?
और जब तक यह सवाल ज़िंदा है,
जब तक हथेलियाँ फफोले सहती हैं,
जब तक पसीना पूँजी में बदलता है—
मई दिवस
सिर्फ एक दिन नहीं रहेगा,
बल्कि एक सतत आंदोलन रहेगा—
श्रमिक सत्ता की सुबह तक।
तो आओ!
फिर से बनाएं वह मंच
जहाँ मजदूर सिर्फ माँग न करे—
बल्कि तय करे
कैसी हो यह दुनिया,
किसके लिए हो उत्पादन,
और किसके हाथों में हो सत्ता।
मई दिवस पर यह संकल्प लें—
कि हम झुकेंगे नहीं,
रुकेंगे नहीं,
क्योंकि
संघर्ष ही जीवन है,
और क्रांति ही मुक्ति की राह।
– *एम के आज़ाद*
