_______उर्दू कविता के अग्रदूतों में से एक निगाह पुरुष-प्रधान क्षेत्र में मान्यता प्राप्त करने वाली पहली महिला कवियों में से एक थीं…!!
______‘कोई दस्तूर होता है’ …!!
नई दिल्ली. ..!!!
___ ज़ेहरा निगाह पाकिस्तान की एक प्रमुख उर्दू कवि और पटकथा लेखिका हैं , जिन्हें प्यार से ‘ज़ेहरा आपा’ के नाम से जाना जाता है। उर्दू कविता के अग्रदूतों में से एक निगाह पुरुष-प्रधान क्षेत्र में मान्यता प्राप्त करने वाली पहली महिला कवियों में से एक थीं। निगाह की उपलब्धियाँ मुशायरा के क्षेत्र में विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं , जहाँ उन्हें पूरी तरह से भाग लेने और एक स्थायी प्रभाव छोड़ने वाली पहली महिला कवि के रूप में माना जाता है। इसके अतिरिक्त, निगाह कभी-कभी एक गीतकार और पटकथा लेखक के रूप में भी काम करती हैं। उनकी एक रचना..!!!
‘कोई दस्तूर होता है’ …!!
सुना है, जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है सुना है,
शेर का जब पेट भर जाए
तो वो हमला नहीं करता,
दरख्तों की घनी छांव में जाकर लेट जाता है
हवा के तेज़ झोंके, जब दरख्तों को हिलाते हैं
तो मैना अपने बच्चे भूलकर
कौव्वे के अंडों को परों से थाम लेती है
सुना है,घोंसले से कोई बच्चा गिर पड़े
तो सारा जंगल जाग जाता है
सुना है, जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है.
सुना है, जब किसी नद्दी के पानी में
बए के घोंसले का गंदुमी साया लरजता है
तो नद्दी की रुपहली मछलियाँ उसको पड़ोसी मान लेती हैं.
कोई तूफ़ान आ जाए, कोई पुल टूट जाए तो,
किसी लकड़ी के तख्ते पर
गिलहरी, सांप,बकरी और चीता
साथ होते हैं
सुना है,जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है.
कोई क़ानून होता है
ख़ुदा बंदा, जलील-ओ-मोतबर, दाना-ओ-बीना
मुंसिफ-ओ-अक़बर
मेरे इस शहर में, मेरे इस मुल्क में
अब जंगलों ही का कोई क़ानून नाफिस कर
कोई दस्तूर नाफिस कर
शायरा: ज़ेहेरा निगाह
