मुझे अपनी पुस्तक राष्ट् बन्दना भेट करते श्री बदन सिह मस्तानासाहित्य समाज का दर्पण है यह कहना आम बात है परंतु जिस साहित्य समाज का दर्द नहीं समाहित होता है पूरा साहित्य कभी भी समाज का दर्पण नहीं बन सकता आज जो साहित्य लिखा जा रहा है उसमें से अधिकांश साहित्यकार या तो हास्य व्यग लेकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहे हैं या फिर अपनी रचना बेचने में लगे हैं कुछ ऐसे भी लेखक हैं योग परिवर्तन के लिए कलम चला रहे हैं परंतु उनकी रचनाएं संसाधनों के अभाव के कारण आम जनता तक नहीं पहुंच पा रहे हैं ऐसे कवि एवं साहित्यकारों की मदद करने की जरूरत है तभी हम समाज को आडंबर और अंधविश्वास की दलदल से बाहर निकाल सकेंगे,!
सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई हो या आर्थिक बराबरी की यह लड़ाइयां जीतने के लिए एक संगठन और की आवश्यकता होती है संगठन जब तक आर्थिक रूप से मजबूत नहीं होते हैं तब तक वह अपने लक्ष्य में कामयाब नहीं हो पाते हैं इसलिए जो लोग आर्थिक रूप से संपन्न है इस लड़ाई में आर्थिक मदद करनी चाहिए सभी साहित्यकार अपनी लखनी को परिवर्तन की दिशा में मोड सकता है और उसके द्वारा लिखा गया साइट समाज का दर्पण बन सकता है